क्या अब पुरुषों की रक्षा के लिए भी चाहिए एक विशेष कानून?
भारत जैसे लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण देश में संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है — चाहे वे पुरुष हों, महिलाएं हों या अन्य कोई पहचान रखते हों। विगत दशकों में महिला सशक्तिकरण की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न जैसे विषयों पर कड़े कानून बनाए गए, और इसका उद्देश्य महिलाओं को सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से सुरक्षित बनाना था।
इन कानूनों ने अनेक महिलाओं को न्याय दिलाया, उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्रदान किया। यह एक सकारात्मक परिवर्तन था, जिसकी प्रशंसा होनी चाहिए। किंतु समय के साथ एक नया सामाजिक पक्ष भी उभर कर सामने आया है — और वह है पुरुषों के प्रति बढ़ती कानूनी और मानसिक प्रताड़ना, जिसकी आज तक कोई व्यापक रूप से न तो चर्चा करता है, न ही समाधान की दिशा में प्रयास होता दिखाई देता है।
पुरुषों की अनकही पीड़ा
देशभर से ऐसी अनेक खबरें सामने आती हैं, जहाँ पुरुषों को दहेज, घरेलू हिंसा या अन्य पारिवारिक विवादों के मामलों में झूठे आरोपों का सामना करना पड़ता है। कई बार ये आरोप केवल पति पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार — माता-पिता, बहन-भाई, यहां तक कि वृद्ध दादा-दादी पर भी लगाए जाते हैं। यह सामाजिक और मानसिक रूप से पूरी एक पीढ़ी को तोड़ देने वाला अनुभव होता है।
ऐसे अनेक मामलों में देखा गया है कि पुरुषों को वर्षों तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं, जबकि वास्तविकता कुछ और होती है। सामाजिक शर्मिंदगी, परिवार की उपेक्षा और मानसिक तनाव के चलते कई पुरुष आत्महत्या जैसे कदम तक उठा लेते हैं। क्या यह हमारी संवैधानिक नैतिकता के अनुरूप है?
क्या पुरुषों की सुरक्षा की बात करना गलत है?
महिला सुरक्षा की बात करना समाज में सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है — और ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन जब कोई पुरुष अपनी पीड़ा व्यक्त करता है, तो उसे या तो अनदेखा कर दिया जाता है या मजाक बना दिया जाता है। यह रवैया समाज के उस हिस्से को चुप करा देता है, जो वास्तव में न्याय का हकदार है।
हम यह नहीं कह रहे कि महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों को कम किया जाए, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि कानून और न्याय व्यवस्था में संतुलन हो। यदि किसी महिला को उसके अधिकार दिलवाने के लिए कानून हैं, तो किसी पुरुष को झूठे आरोपों से बचाने के लिए भी मजबूत कानून होने चाहिए।
समाज, न्यायपालिका और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी
समाज का हर हिस्सा — न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापालिका — इस को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। अब आवश्यकता है कि सरकार संविधान में आवश्यक संशोधन कर ऐसे कानूनों की नींव रखे, जो झूठे आरोपों के खिलाफ पुरुषों की भी रक्षा कर सकें।
साथ ही, मीडिया और सामाजिक संस्थाओं की यह जिम्मेदारी है कि वे न केवल महिलाओं की आवाज़ बनें, बल्कि पुरुषों की भी पीड़ा को न्याय तक पहुंचाएं। यह किसी एक पक्ष की लड़ाई नहीं है, यह एक संतुलित, न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज की जरूरत है।
हम किसी एक पक्ष के हमदर्द नहीं हैं — न पुरुषों के, न महिलाओं के। हम तो केवल समाज की वो आवाज़ हैं, जो पीड़ित की पीड़ा को सत्ता और व्यवस्था तक पहुंचाना चाहती है। लोकतंत्र में न्याय केवल एक पक्ष का नहीं होता, न्याय सबके लिए होना चाहिए।
अब समय आ गया है कि सरकार, समाज और न्याय व्यवस्था इस विषय पर गंभीर चिंतन करें और आवश्यक कदम उठाएं। क्योंकि न्याय वही है जो सबके लिए समान हो — चाहे वह पुरुष हो या महिला।

