नई वित्तीय वर्ष की शुरुआत: महंगाई की मार से जूझता आम नागरिक
1 अप्रैल 2025 को देश ने एक और वित्तीय वर्ष की शुरुआत की, लेकिन यह शुरुआत आम नागरिकों के लिए राहत नहीं, बल्कि महंगाई की नई मार लेकर आई। बीते एक वर्ष में सरकार द्वारा कई वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय लिए गए, जिनमें जिला सहकारी केंद्रीय बैंक द्वारा 90% से अधिक राजस्व वसूली की बात सामने आई। यह आवश्यक है कि इस वसूली की निष्पक्ष जांच की जाए कि यह वास्तव में वैध है या केवल कागजी आंकड़ों की बाजीगरी।
महंगाई की मार और सरकारी योजनाएं
बीते वर्ष में महंगाई ने आम लोगों की आर्थिक स्थिति को और अधिक कमजोर कर दिया है। इसके पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन इनमें प्रमुख भूमिका सरकारी निशुल्क योजनाओं की भी रही। सरकार द्वारा चलाई जा रही मुफ्त योजनाओं का वित्तीय भार कहीं न कहीं करदाता जनता पर ही पड़ता है।
कई लोग यह भ्रम पालते हैं कि वे टैक्स नहीं देते, लेकिन सच्चाई यह है कि हर नागरिक, चाहे वह गरीब हो या अमीर, अपनी रोजमर्रा की खरीदारी में अप्रत्यक्ष रूप से टैक्स भरता है। वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ने के साथ टैक्स की दरें भी बढ़ जाती हैं, जिससे गरीबों पर और अधिक आर्थिक बोझ पड़ता है।
डीजल, पेट्रोल, दूध, मसाले, कपड़ा, स्टेशनरी जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वस्तुओं की कीमतें नहीं बढ़ रहीं, बल्कि मुद्रा की कीमत गिर रही है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जो डीजल-पेट्रोल कभी ₹30-40 प्रति लीटर था, वह अब ₹100 लीटर से अधिक हो चुका है। इसी तरह, सोना जो कभी ₹40,000-₹45,000 प्रति तोला था, वह अब ₹90,000 तक पहुंच चुका है। चांदी की कीमत भी ₹50,000 प्रति किलो से बढ़कर ₹1,00,000 के पार चली गई है।
धार्मिक और सामाजिक प्रभाव
भारत में सनातन धर्म और उसकी परंपराओं का विशेष महत्व है। विवाह संस्कार में कन्यादान के समय स्वर्ण और वस्त्र दान करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, लेकिन मौजूदा महंगाई के कारण गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह लगभग असंभव होता जा रहा है। क्या यह परंपराएं अब केवल संपन्न वर्ग तक सीमित रह जाएंगी?
सनातन और वैदिक धर्म में स्वर्ण और चांदी का विशेष महत्व है। चांदी को चंद्र ग्रह और शीतलता का प्रतीक माना जाता है, जबकि सोना शनिदेव से जुड़ा हुआ है। महंगाई बढ़ने के कारण अब धार्मिक रीति-रिवाज निभाना भी कठिन हो गया है। क्या सरकार को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए कि गरीब वर्ग भी अपनी परंपराओं को निभा सके?
जनप्रतिनिधियों की उदासीनता
जहां एक ओर आम जनता महंगाई की मार से त्रस्त है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि अपने वेतन और भत्ते बढ़ाने में व्यस्त हैं। मजदूर, किसान और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार जो सबसे अधिक प्रभावित हैं, उनकी पीड़ा से सत्ता और विपक्ष दोनों अनजान बने हुए हैं। लोकसभा और राज्यसभा में महंगाई पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इसके बजाय अन्य मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बजट में केवल आर्थिक नीतियों की घोषणाएं ही न हों, बल्कि यह भी बताया जाए कि मुद्रा की वास्तविक कीमत कितनी घटी और इससे आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ा।
नए वित्तीय वर्ष का स्वागत या संकट?
1 अप्रैल 2025 को हम सब मिलकर नए वित्तीय वर्ष का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस वर्ष महंगाई और बढ़ेगी, या सरकार इसे नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाएगी? या फिर हम केवल राम मंदिर, हिंदू-मुस्लिम और सनातन धर्म की चर्चाओं में ही उलझे रहेंगे?
देश के हर नागरिक को यह सोचना होगा कि क्या हम केवल धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों में उलझकर अपनी वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे हैं? महंगाई का प्रभाव केवल एक वर्ग पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ रहा है। अब समय आ गया है कि सरकार और जनप्रतिनिधि इस विषय को गंभीरता से लें और महंगाई पर ठोस नीतियां बनाएं, ताकि हर नागरिक को आर्थिक रूप से सुरक्षित भविष्य मिल सके।


