क्या यही है राम राज्य? रीवा संभाग में कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति पर एक जनचिंतन कौन सुरक्षित है? जब तहसीलदार, पुलिस और पत्रकार भी नहीं बचे
मध्यप्रदेश के रीवा संभाग — जिसमें रीवा, सतना, सीधी और मऊगंज जैसे महत्वपूर्ण जिले शामिल हैं — आज एक गहरे असुरक्षा के संकट से जूझ रहा है। राज्य सरकार चाहे जितने दावे कर ले कि प्रदेश में "रामराज्य" स्थापित हो चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। जब न महिलाएं सुरक्षित हों, न बच्चियां, न युवा और न ही बुज़ुर्ग; जब न्याय दिलाने वाली पुलिस स्वयं असुरक्षित महसूस करे; जब प्रशासनिक अधिकारी तक भय के साये में काम करें — तो यह कैसा रामराज्य है?
जनता पूछ रही है — सुरक्षित है तो कौन?
रीवा संभाग में हाल के दिनों में जिस प्रकार की घटनाएं सामने आई हैं, वे न सिर्फ चिंता पैदा करती हैं, बल्कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व पर गंभीर प्रश्नचिन्ह भी खड़ा करती हैं। जिन तहसीलदारों और पटवारियों के हाथ में प्रशासनिक व न्यायिक अधिकार होते हैं, यदि वे ही खुलेआम हमलों का शिकार हो रहे हों, तो आम नागरिक किससे अपनी सुरक्षा की उम्मीद करे?
आज हालत यह हो चुकी है कि अपराधी बेखौफ होकर घूम रहे हैं। वे जानते हैं कि सफेदपोश नेताओं की छत्रछाया उन्हें किसी भी कार्रवाई से बचा सकती है। वहीं पुलिसकर्मी और प्रशासनिक अमला या तो भयभीत है या राजनैतिक दबाव में बंधा हुआ।
भाजपा से अपेक्षाएं थी, लेकिन...
प्रदेश की जनता ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार से नाराज़ होकर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता सौंपी थी — उम्मीद के साथ कि अब "सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास" का यथार्थ रूप दिखाई देगा। लेकिन अब वही जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। जिस सत्ता को उन्होंने रामराज्य की आस में चुना था, आज उसी के शासन में उनके प्राण और प्रतिष्ठा दोनों खतरे में हैं।
जब ‘चौथा स्तंभ’ भी असुरक्षित हो...
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह वह माध्यम है जो जनता और सरकार के बीच संवाद का पुल बनाता है। लेकिन जब पत्रकारों पर सरेआम हमले हों, उन्हें पीटा जाए, धमकाया जाए, तो यह लोकतंत्र के गहरे पतन की निशानी है। अगर संवाद का यह पुल भी टूट जाए, तो फिर जनता अपनी पीड़ा किससे साझा करेगी?
मुख्यमंत्री से सीधा सवाल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी, क्या यही है आपकी सरकार का ‘रामराज्य’? क्या यही है ‘गुड गवर्नेंस’? अगर पुलिस, पत्रकार, प्रशासनिक अधिकारी और आम जनता — कोई भी सुरक्षित नहीं है, तो यह शासन किसके लिए है?
जनता को जवाब चाहिए। सिर्फ भाषण नहीं, सिर्फ नारों से काम नहीं चलेगा। जनता के विश्वास का उत्तरदायित्व सिर्फ प्रचार से नहीं, बल्कि ज़मीन पर ठोस कार्य से निभाया जाता है।
जनता जाग चुकी है
आज जनता असहाय नहीं है। वह देख रही है, समझ रही है, और सवाल भी कर रही है। अगर सत्ता सच में "जनसेवा" का माध्यम है, तो अब आपको सिर्फ शासन नहीं, बल्कि संवेदना के साथ प्रशासन चलाना होगा।
रीवा संभाग की यह हालत समूचे प्रदेश की स्थिति की एक झलक है। अगर अभी भी आंखें नहीं खुलीं, तो कल यह असंतोष आंदोलन बन जाएगा। और तब बहुत देर हो चुकी होगी।

