चोरी के कथित मामले में बनाए गए गवाह खुद चकित, बीजेपी नेता बोले—हमसे ली गई बयान की जानकारी झूठी; पुलिस कार्यशैली पर उठे सवाल
मऊगंज जिले में कानून व्यवस्था को लेकर एक बार फिर पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। नईगढ़ी जनपद पंचायत अध्यक्ष ममता कुंजबिहारी तिवारी के पति और अगस्त क्रांति मंच के संयोजक कुंजबिहारी तिवारी के खिलाफ दर्ज एक कथित चोरी के मामले ने पुलिस की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गहरे प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं।
इस मामले में जो एफआईआर दर्ज की गई है, उसमें जिन प्रमुख व्यक्तियों को गवाह बनाया गया है, उन्होंने स्वयं सामने आकर न केवल अपने बयान को झूठा बताया, बल्कि साफ आरोप लगाया है कि पुलिस ने राजनीतिक दबाव में कार्य करते हुए उनकी जानकारी के बिना उन्हें गवाह बना दिया। इन गवाहों में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े वरिष्ठ नेता भी शामिल हैं, जिनकी विश्वसनीयता और सामाजिक हैसियत को देखते हुए पूरे प्रकरण पर लोगों की पैनी नजर बनी हुई है।
गवाहों का दावा: “हमसे नहीं ली गई कोई जानकारी”
बीजेपी नेताओं ने प्रेस के सामने आकर स्पष्ट कहा कि उन्होंने न तो चोरी की कोई घटना देखी है और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी थी। इसके बावजूद उन्हें एफआईआर में प्रमुख गवाह के रूप में नामित कर देना इस बात का संकेत है कि पुलिस प्रशासन किसी न किसी दबाव में कार्य कर रहा है और सच्चाई को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है।
पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति और वास्तविकता में विरोधाभास
पुलिस द्वारा जारी प्रेस नोट में मामले की तफ्तीश को वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन और मार्गदर्शन में निष्पक्ष व न्यायसंगत बताया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत नजर आ रही है। गवाहों की आपत्तियों और एफआईआर की भाषा से यह साफ प्रतीत होता है कि कार्रवाई एकतरफा और पूर्वनियोजित थी।
पूर्व के विवादित मामले: ‘गडरा कांड’ से नहीं ली कोई सीख
यह पहला मौका नहीं है जब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हों। इससे पहले भी मऊगंज जिले के गडरा कांड में पुलिस की भूमिका पर तीखा जनविरोध सामने आया था। बावजूद इसके पुलिस प्रशासन ने कोई ठोस सबक नहीं लिया। नईगढ़ी, शाहपुर और लौर जैसे थानों में पदस्थ उपनिरीक्षक जगदीश ठाकुर पर पूर्व में भी लापरवाही, पक्षपात और कानून व्यवस्था से खिलवाड़ के आरोप लग चुके हैं।
जनता में रोष, पुलिस की कार्यशैली को लेकर गहरा असंतोष
पुलिस की इस तरह की कार्रवाई से आम नागरिकों में असंतोष और अविश्वास का माहौल बनता जा रहा है। जनता यह सवाल पूछ रही है कि यदि गवाह खुद ही एफआईआर को झूठा बता रहे हैं, तो फिर आखिर किस आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई? क्या यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है?
जरूरत है जवाबदेही और पारदर्शिता की
एक लोकतांत्रिक समाज में पुलिस प्रशासन का कार्य निष्पक्षता, न्याय और संवैधानिक मूल्यों के तहत होना चाहिए। लेकिन जब पुलिस खुद राजनीतिक हथियार के रूप में कार्य करने लगे, तो कानून व्यवस्था की रीढ़ ही चरमरा जाती है। मऊगंज पुलिस को चाहिए कि वह इस मामले में पारदर्शिता के साथ स्पष्टीकरण दे और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करे।

