रीवा-मऊगंज: बेलगाम अपराध, मेडिकल नशा और प्रशासनिक निष्क्रियता पर उठते सवाल
– क्या मध्यप्रदेश की कानून व्यवस्था पुनः 2004 से पहले की स्थिति की ओर लौट रही है?
रीवा/मऊगंज, मध्यप्रदेश।
रीवा और मऊगंज जिलों में बीते कुछ महीनों से अपराध और अव्यवस्था की घटनाएं जिस तरह से लगातार सामने आ रही हैं, उसने प्रशासन, पुलिस व्यवस्था और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अपराधियों का दुस्साहस इस हद तक बढ़ चुका है कि अब आम लोग भी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं।
लौरी कला में युवक पर जानलेवा हमला
सबसे हालिया और चौंकाने वाली घटना थाना गढ़ अंतर्गत ग्राम पंचायत लौरी खुर्द की है, जहाँ दिनांक 29 मई 2025 की दोपहर करीब 2से 3 बजे के आस पास एक युवक पर लाठी डंडे से प्राणघातक हमला किया गया। युवक की हालत गंभीर थी। । सूत्रों के अनुसार, हमलावर लौरी गांव के ही निवासी हैं।
स्थानीय लोगों द्वारा उपलब्ध कराए गए ऑडियो और वीडियो फुटेज यह स्पष्ट करते हैं कि आरोपियों को पुलिस या कानून का कोई डर नहीं है। वीडियो में कुछ आरोपी खुलेआम पुलिस की चुनौती दे रहे हैं, जिससे यह साफ झलकता है कि अपराधियों को कहीं न कहीं राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त हो सकता है।
बढ़ता मेडिकल नशा: युवा पीढ़ी के लिए अभिशाप
रीवा और मऊगंज जिले में अपराध के साथ-साथ मेडिकल नशे का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। नशीली दवाओं की अवैध बिक्री और वितरण अब छोटे कस्बों और गांवों तक पहुँच चुकी है। युवाओं को कोरेक्स, ट्रामाडोल, अल्प्राजोलम जैसी दवाओं का लती बनाया जा रहा है, जिससे उनमें अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
यह सिलसिला केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पतन का संकेत बनता जा रहा है। सवाल उठता है – कहाँ है प्रशासन? कहाँ है ड्रग्स कंट्रोल ब्यूरो? और क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कोई जवाबदेही नहीं बनती?
प्रशासनिक उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी
इन सब घटनाओं के बीच स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी सबसे ज्यादा खटकने वाली बात बन गई है। जनता यह जानना चाहती है कि जो नेता चुनाव के समय हर दरवाजे पर हाथ जोड़कर वोट मांगते हैं, आज उस जनता की सुरक्षा के मुद्दे पर मौन क्यों हैं?
कई ऐसे जनप्रतिनिधि इस समय प्रदेश सरकार में मंत्री या वरिष्ठ पदों पर आसीन हैं, लेकिन अपने ही क्षेत्र में कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति पर उनकी चुप्पी जनता के बीच आक्रोश का कारण बन रही है।
क्या 2004 से पहले वाली स्थिति की ओर लौट रहा है प्रदेश?
यह स्थिति कुछ हद तक 2004 के पहले के मध्यप्रदेश की याद दिलाती है, जब कांग्रेस शासन में अपराध, आरक्षण की राजनीति, जातिवादी दंगे और नशे का बोलबाला था। उसी के परिणामस्वरूप जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया और भाजपा को सत्ता सौंपी।
लेकिन आज भाजपा की ही सरकार में अपराधियों के हौसले बुलंद हैं, मेडिकल नशा खुलेआम बिक रहा है और पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। क्या यही "सुशासन" का दावा था?
संगठन के लिए आत्मचिंतन का समय
भारतीय जनता पार्टी, जिसे विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन कहा जाता है, अब यह विचार करना होगा कि आखिर क्यों उनके ही शासित प्रदेशों में कानून व्यवस्था ढहती दिख रही है? क्या पार्टी अब केवल हिंदू-मुसलमान की राजनीति तक सीमित रह जाएगी या समाज के बुनियादी मुद्दों – जैसे सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय – पर भी ध्यान केंद्रित करेगी?
यदि समय रहते संगठन और सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो जनता उसी तरह से सत्ता से बेदखल करने में देर नहीं करेगी, जैसे कांग्रेस को 25 साल पहले किया था।
रीवा और मऊगंज जिले की घटनाएँ केवल एक क्षेत्रीय संकट नहीं हैं, बल्कि यह प्रदेश की कानून व्यवस्था के गिरते स्तर का संकेत हैं। यदि आज इन घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में यह संकट पूरे प्रदेश के लिए गहरा घाव बन सकता है।
अब समय आ गया है कि जनप्रतिनिधि और शासन-प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों को समझें, जनता के विश्वास को कायम रखें और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए



