पानी-पानी रीवा-मऊगंज: जब जनता प्यासी,
गर्मी अपने चरम पर है, सूरज आसमान से अंगारे बरसा रहा है, पर रीवा और मऊगंज अंचल की ज़मीन पर पानी का एक कतरा भी आमजन की पहुँच से बाहर होता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि लोगों की दिनचर्या पानी की तलाश से शुरू होती है और उसी में समाप्त हो जाती है।
ग्राम पंचायत गढ़, जो जनपद पंचायत गंगेव की तीसरी सबसे बड़ी पंचायत मानी जाती है, वहां की स्थिति अत्यंत गंभीर है। यह पंचायत न केवल स्थानीय प्रशासनिक केंद्रों से जुड़ी है, बल्कि इसके चारों ओर पांच किलोमीटर तक के गांवों के लोग बस से यात्रा करते हुए इसी से गुजरते हैं। यही नहीं, यहां थाना, पशु चिकित्सालय, आयुर्वेदिक औषालय, स्कूल और उप-तहसील जैसे कई आवश्यक संस्थान भी हैं। लेकिन इन सबके बीच, यहां के नागरिकों के लिए पीने के पानी का कोई स्थायी समाधान नहीं है।
जल संकट के दृश्य – टैंकर खड़े, पर पानी नहीं
मौके पर पहुंचे तो ग्राम पंचायत गढ़ में तीन टैंकर खड़े हुए मिले। स्थानीय विधायक इंजीनियर नरेंद्र प्रजापति ने पंचायतों में टैंक व मोटरें लगवाने की बात कही थी, पर हकीकत ये है कि ये टैंकर अब महज "लोहे की मूर्तियां" बनकर रह गए हैं। हैंडपंप सूख चुके हैं, टंकियां खाली हैं और तालाबों का नामोनिशान मिट चुका है।
‘पानी’ अब व्यापार बन गया है
जो लोग सक्षम हैं, वे 20 से 30 रुपये में 40 लीटर पानी खरीदते हैं। लेकिन गरीब? वे या तो दूसरों के दरवाजे पर हाथ फैलाते हैं या फिर दूर-दूर तक दौड़ते हैं। कई बार तो पूरी रात जागकर लाइन में लगना पड़ता है। गढ़ के ग्रामीण बताते हैं कि सुबह 3 बजे से ही महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे पानी भरने के लिए दौड़ लगाना शुरू कर देते हैं। यह सिलसिला रात 10 बजे तक चलता है।
जनता की न सुनवाई, न सुनवाई की कोशिश
ग्रामवासियों ने बताया कि विधायक द्वारा दो वर्षों से लगातार आश्वासन मिल रहे हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं बदला। जल जीवन मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं केवल कागजों में जीवित हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस योजना का लाभ केवल पाइप बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों को मिला है।
तहसील, अधिवक्ता और न्यायिक प्रक्रिया तक प्रभावित
गढ़ उप-तहसील के अधिवक्ताओं से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि यहां आने वाले पक्षकार और वकील भी पानी के लिए परेशान हैं। तहसील कार्यालय के सामने एक खाली पानी की टंकी और सूखा टैंकर खड़ा है, जो वर्षों से उपयोग में नहीं लाया गया। ना किसी सामाजिक संस्था ने प्याऊ खोला, ना प्रशासन ने कोई अस्थायी राहत दी।
राजनीति और वादों का खोखलापन
यह वही मनगवा विधानसभा है, जिसने राज्य को कई दिग्गज नेता दिए—पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी, गिरीश गौतम, रुक्मणि रमन प्रताप सिंह, और सांसद यमुना प्रसाद शास्त्री। लेकिन आज जब जनता को पीने के पानी की जरूरत है, तब उनके उत्तराधिकारी सिर्फ राजनीति की गणनाओं में व्यस्त हैं।
भाजपा को यहां के लोग लगातार दो-तिहाई बहुमत से जिताते आए हैं, लेकिन जब बदले में पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता भी पूरी न हो, तो लोकतंत्र की आत्मा पर चोट होती है।
‘जल जीवन मिशन’ – नाम बड़ा, दर्शन नहीं
सरकार की प्रमुख पेयजल योजना "जल जीवन मिशन" की बात करें, तो यह योजना आज सिर्फ दो वर्गों के लिए ही सफल दिखती है – एक पाइप आपूर्ति कंपनियों के लिए और दूसरे ठेकेदारों के लिए। ज़मीनी हकीकत ये है कि खारा पानी भी अब दुर्लभ होता जा रहा है, और मीठा पानी सिर्फ चुनावी वादों तक सीमित है।
जब मूलभूत आवश्यकता—पानी—के लिए जनता को इस कदर संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि नैतिक पतन का भी संकेत है। गढ़ पंचायत जैसे क्षेत्र जहां सरकारी कार्यालय और स्कूल हैं, यदि वहां पानी की ये स्थिति है, तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दूरस्थ बस्तियों का हाल क्या होगा।
अब समय आ गया है कि जनप्रतिनिधि केवल वादे न करें, बल्कि अपने क्षेत्र की जनता के बीच जाकर धरातल पर काम करें। अन्यथा जनता का आक्रोश उनके चुनावी भविष्य को बंजर बना सकता है—ठीक उसी तरह जैसे ये ज़मीन बिना पानी के हो चुकी है।


