राष्ट्रीय राजमार्ग या नरसंहार का गलियारा? रीवा-मऊगंज में मौत के मुंह में जाती सड़कें, सरकार और प्रशासन बेखबर
विशेष प्रतिनिधि विंध्य वसुंधरा समाचार| रीवा
झाबुआ की हृदयविदारक सड़क दुर्घटना, जिसमें नौ मासूमों की जान चली गई, ने एक बार फिर इस प्रश्न को जीवित कर दिया है—क्या हमारी सड़कें जीवन का मार्ग हैं या मृत्यु का निमंत्रण? झाबुआ की यह त्रासदी क्या रीवा, मऊगंज और विंध्य क्षेत्र के अन्य जिलों के लिए कोई चेतावनी बनेगी? शायद नहीं। क्योंकि रीवा जिले की राष्ट्रीय राजमार्ग 30 और 35 की जमीनी सच्चाई आज भी सन्न कर देने वाली है।
सड़कों की दुर्दशा: कागजों में स्वर्णिम, ज़मीन पर शर्मनाक
रीवा जिले के मनगवा से लेकर चाकघाट तक का मार्ग तथाकथित "राष्ट्रीय राजमार्ग" है, लेकिन हालात देखकर यही लगता है कि यह राजमार्ग नहीं, 'रोग मार्ग' है। यहां की सड़कें इतनी जर्जर हैं कि दोपहिया वाहन आए दिन फिसलते हैं और फिर पीछे से आने वाले ट्रकों की चपेट में आकर काल के गाल में समा जाते हैं। इन मार्गों पर गति सीमा 80 किमी प्रतिघंटा है, लेकिन न सड़कें उस लायक हैं, न यातायात प्रबंधन।
डिवाइडर नहीं, खुले मौत के द्वार
रीवा से चाकघाट के बीच बने डिवाइडरों में करीब 45 से अधिक अनधिकृत और अनियोजित कट बने हुए हैं। इन कटों से दोनों ओर से वाहन अचानक सड़क पार करते हैं जिससे हाई-स्पीड में आ रहे वाहन को संभालना असंभव हो जाता है। परिणामस्वरूप दुर्घटनाएं आम हो गई हैं। इन कटों का इंजीनियरिंग मानकों से कोई वास्ता नहीं—ये या तो राजनीतिक दबाव में बनाए गए हैं, या स्थानीय प्रभावशाली लोगों की "सुविधा" के लिए।
अधूरे ब्रिज, पूरा टोल – क्या यही है ‘गुड गवर्नेंस’?
इन राष्ट्रीय राजमार्गों पर कई ऐसे फ्लाईओवर या ब्रिज हैं जो वर्षों से अधूरे पड़े हैं। मगर टोल टैक्स की वसूली पूरी वफादारी से हो रही है। सवाल यह उठता है कि जब सुविधाएं अधूरी हैं, तो जनता से वसूली किस आधार पर हो रही है? क्या रीवा और मऊगंज जिले पर कोई अलग नियम लागू होते हैं? क्या राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और राज्य सरकार की जवाबदेही सिर्फ टोल के कलेक्शन तक सीमित रह गई है?
वृक्ष कटाई और पर्यावरणीय अपराध का महाघोटाला
2018 में जब इन सड़कों का निर्माण प्रारंभ हुआ, तो हजारों पुराने वृक्ष काटे गए। सरकारी नियमों के अनुसार जितने पेड़ काटे जाते हैं, उनका दस गुना वृक्षारोपण अनिवार्य है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई ये है कि न वृक्ष लगे, न निगरानी हुई। उल्टा, जहाँ पुराने वृक्ष आज भी खड़े थे, वहां बिना अनुमति के उन्हें काटकर डामर बिछाया जा रहा है। वन विभाग, जो इस पूरे मामले का संरक्षक होना चाहिए था, वह या तो मौन है या साजिश में सहभागी।
वृक्षारोपण – रिकॉर्ड में हरियाली, ज़मीन पर वीरानी
रीवा जिले में एक ताकतवर व्यक्ति को वृक्षारोपण का ठेका मिला है। रिकॉर्ड में हजारों पौधे लगाए गए हैं, लेकिन ज़मीन पर न हरियाली है, न ऑक्सीजन। यह पर्यावरण नहीं, भ्रष्टाचार की खेती है—जहां कागज़ी पौधे सरकारी फाइलों में पनपते हैं, और असली पौधे विकास के नाम पर कट जाते हैं।
दुर्घटनाएं – भाग्य नहीं, व्यवस्था की हत्या
रीवा और मऊगंज जिले के शायद ही कोई गांव बचे हैं जहां पिछले कुछ वर्षों में मोटरसाइकिल या वाहन दुर्घटना में किसी की जान न गई हो। परिजन इसे भगवान का लेखा मानकर चुप बैठ जाते हैं, लेकिन असल में यह कायर प्रशासन, लापरवाह इंजीनियरिंग और मूक शासन की हत्या है। अगर यही नियति है, तो फिर सड़कें क्यों बनती हैं? बीमा क्यों कराया जाता है? योजनाएं क्यों घोषित होती हैं?
समाज के सामने सवाल, सरकार के सामने चुनौती:
क्या रीवा-मऊगंज की सड़कें इसी तरह कब्रगाह बनी रहेंगी?
क्या राष्ट्रीय राजमार्गों पर सिर्फ टोल की वसूली प्राथमिकता रहेगी?
क्या पेड़ काटना ही विकास है, और वृक्षारोपण सिर्फ दिखावा?
क्या रीवा जैसे संवेदनशील जिलों में कभी किसी अधिकारी को जवाबदेह ठहराया जाएगा?
जब भ्रष्टाचार को संरक्षण और पीड़ित को उपेक्षा मिलती है, तब सड़कें रास्ते नहीं रहतीं—वो नरसंहार के गलियारे बन जाती हैं। रीवा जिले के नागरिकों को अब यह प्रश्न सरकार से पूछना ही होगा—क्या विकास की कीमत हमेशा हमारे जीवन से ही चुकाई जाएगी?

