🔴 अनुकंपा नियुक्ति घोटाले में सुदामा और अखिलेश निलंबित, पर गंगा उपाध्याय और राजेश मिश्रा को अभयदान क्यों?
राजेश मिश्रा: घोटाले का सूत्रधार या किसी 'सिस्टम' का संरक्षित चेहरा?
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
जिले में अनुकंपा नियुक्तियों के नाम पर वर्षों से चल रही कथित बंदरबांट का पर्दाफाश होने के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। जांच के बाद जहां तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी सुदामा लाल गुप्ता, योजना अधिकारी अखिलेश मिश्रा और प्रभारी लिपिक रामप्रसन्न द्विवेदी को निलंबित कर दिया गया है, वहीं इसी घोटाले की जड़ माने जा रहे पूर्व डीईओ गंगा प्रसाद उपाध्याय और सहायक संचालक राजेश मिश्रा को चुपचाप ‘क्लीन चिट’ दिए जाने से सवालों का तूफान उठ खड़ा हुआ है।
प्रशासनिक कार्रवाई की इस दोहरी नीति ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या कुछ लोगों को राजनीतिक या संगठनात्मक संरक्षण प्राप्त है? यदि नहीं, तो फिर एक ही मामले में भिन्न-भिन्न मापदंड क्यों?
🔎 क्या है पूरा मामला?
बृजेश कोल की अनुकंपा नियुक्ति में फर्जीवाड़ा उजागर होने के बाद वर्ष 2023-24 की 36 नियुक्तियों की जांच कराई गई, जिसमें छह नियुक्तियां संदिग्ध पाई गईं। इनमें से पांच नियुक्तियों पर सुदामा लाल गुप्ता और अखिलेश मिश्रा के हस्ताक्षर पाए गए, जबकि एक नियुक्ति तत्कालीन डीईओ गंगा उपाध्याय के कार्यकाल में, सहायक संचालक राजेश मिश्रा की अनुशंसा पर की गई थी।
सूत्रों के अनुसार, सबसे पहली फर्जी नियुक्ति 13 मार्च 2024 को हुई, जब गंगा उपाध्याय और राजेश मिश्रा की मिलीभगत से अंजेश कोल (जिसे पहले ही प्यून पद पर नियुक्त किया जा चुका था) के स्थान पर उसकी बहन साधना कोल को दोबारा अनुकंपा नियुक्ति दे दी गई। यहीं से इस घोटाले की शुरुआत हुई।
🧩 राजेश मिश्रा: एक योजनाबद्ध घोटाले का मास्टरमाइंड?
सूत्रों का दावा है कि तत्कालीन डीईओ गंगा उपाध्याय के डाइट तबादले से ऐन पहले, सहायक संचालक राजेश मिश्रा ने उनसे हस्ताक्षर करवा कर साधना कोल की नियुक्ति का आदेश जारी कराया। यानि, इस नियुक्ति के "लिंक अधिकारी" स्वयं राजेश मिश्रा थे। इसके बाद फर्जी नियुक्तियों का सिलसिला जारी रहा — लेकिन अब तक की जांच में सबसे पहला और निर्णायक मामला गंगा और राजेश की जोड़ी से जुड़ा हुआ है।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है — जब इस पूरी श्रृंखला की “जननी नियुक्ति” में इन दोनों की सीधी संलिप्तता है, तो इन्हें दंडित करने के बजाय संरक्षण क्यों दिया जा रहा है?
⚖️ प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवालिया निशान
एक ही घोटाले में संलिप्त लोगों के प्रति अलग-अलग व्यवहार से प्रशासन की निष्पक्षता संदेह के घेरे में है।
राजेश मिश्रा के संरक्षण में कौन?
क्या कोई राजनैतिक हस्तक्षेप इस ‘साफ बचाव’ के पीछे है?
📣 प्रशासन को देना होगा जवाब
जनमानस में यह चर्चा जोरों पर है कि यदि सबसे पहले फर्जी नियुक्ति करने वाले अफसर को बख्शा जाएगा, तो बाकी दोषियों पर की गई कार्रवाई की क्या नैतिक वैधता रह जाएगी? न्यायालय में प्रशासन के लिए जवाब देना भी कठिन हो सकता है, यदि इस मुद्दे को जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई।
नोट: यह समाचार सूत्रों एवं वायरल वीडियो से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि 'विंध्य वसुंधरा समाचार' द्वारा नहीं की गई है। सत्यता की पुष्टि एवं प्रशासनिक कार्रवाई के उपरांत स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।


