रीवा जिले में खाद्यान्न वितरण व्यवस्था सवालों के घेरे में: आदेश के विपरीत विक्रेताओं की मनमानी, दो माह का राशन देकर जनता को ठगा जा रहा है
रीवा, 17 जून | विशेष रिपोर्ट
मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र हितग्राहियों को तीन माह का खाद्यान्न एक साथ वितरित किए जाने की सरकारी घोषणा के बावजूद रीवा जिले में वितरण प्रणाली पूरी तरह से अव्यवस्थित और भ्रामक स्थिति में पहुंच गई है। जिला प्रशासन के स्पष्ट निर्देशों को ताक पर रखते हुए कई शासकीय उचित मूल्य दुकानों पर विक्रेताओं द्वारा न केवल मात्र दो माह का राशन दिया जा रहा है, बल्कि वितरण प्रक्रिया में भी भारी अनियमितताएं देखने को मिल रही हैं।
सरकारी घोषणा और जमीनी हकीकत में साफ फर्क
जिला कलेक्टर प्रतिभा पाल द्वारा समाचार पत्रों के माध्यम से यह सार्वजनिक किया गया था कि जून जुलाई अगस्त 2025 — तीन माह का खाद्यान्न हितग्राहियों को एक साथ मिलेगा। लेकिन गढ़, लोरी और सहित अन्य क्षेत्रों में अनेक उपभोक्ताओं ने शिकायत की है कि उन्हें सिर्फ दो माह का ही राशन दिया गया, वह भी बिना किसी वैध कारण के।
POS मशीन की जगह हस्तलिखित पर्ची: पारदर्शिता पर सवाल
वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए शासन द्वारा ई-पॉस मशीन का उपयोग अनिवार्य किया गया है, जिससे वितरण का पूरा रिकॉर्ड डिजिटली दर्ज हो सके। लेकिन उपभोक्ताओं ने बताया कि उन्हें पोस मशीन की पर्ची न देकर हस्तलिखित पर्चियाँ थमा दी जा रही हैं, जिससे उन्हें यह भी नहीं पता चल रहा कि उनके नाम पर कितने राशन की एंट्री की गई है।
यह न केवल शासन की डिजिटल निगरानी प्रणाली को दरकिनार करना है, बल्कि संभावित राशन गड़बड़ी और हेराफेरी की जमीन भी तैयार करता है। वितरण का कार्य शासन के अधिकृत व्यक्ति को ही करना था किंतु ठेकों में दिया गया है। तौल काटे में मनमानी वजन सेट करके उपभोक्ताओं को खाद्यान्न दिए जा रहे है।
न कोई आदेश, न कोई सूचना — फिर दो माह का राशन क्यों?
इन दुकानों पर कहीं भी यह सूचना प्रदर्शित नहीं की गई है कि केवल दो माह का खाद्यान्न क्यों वितरित किया जा रहा है। कोई सार्वजनिक सूचना, आदेश प्रतिलिपि या प्रशासनिक नोटिस दुकानों पर नहीं चस्पा है।
जब इस विषय में खाद्य विभाग से जुड़े एक अधिकारी से नाम न छापने की शर्त पर बात की गई, तो उन्होंने बताया कि "शासन से ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है कि दो माह का राशन दिया जाए। वितरण तीन माह का ही होना है। यदि खाद्यान्न की कमी हो, तो शेष उपभोक्ताओं को बाद में तीन माह का खाद्यान्न मिलेगा। लेकिन अभी दो माह का ही बांटना, वह भी बिना आदेश के — पूरी तरह गलत है।"
मौखिक आदेश की आड़ या जानबूझकर घोटाले की तैयारी?
कुछ विक्रेताओं ने दावा किया कि उन्हें "मौखिक निर्देश" मिले हैं कि अभी दो माह का खाद्यान्न वितरित करें। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि यह निर्देश किस अधिकारी ने और कब दिए, तो उनके पास कोई लिखित प्रमाण नहीं था। यह पूरी प्रक्रिया खाद्यान्न वितरण व्यवस्था में संभावित घोटाले की आशंका को बल देती है।
डर में जी रहे उपभोक्ता — नाम बताने से कतरा रहे
अधिकतर उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज कराने से भी डर रहे हैं। उनका कहना है कि "अगर हमने खुले रूप से शिकायत की, या समाचार में हमारा नाम छपा, तो अगली बार हमें राशन नहीं मिलेगा। विक्रेता मनमानी करते हैं और बदला लेने से भी नहीं चूकते।"
यह स्थिति दर्शाती है कि खाद्यान्न वितरण प्रणाली में भय और दबाव का माहौल बना हुआ है, जो लोकतांत्रिक प्रशासन और योजनाओं के उद्देश्य के खिलाफ है।
यह मनमानी नहीं रुकी, तो बड़ा खाद्यान्न घोटाला तय!
जनता पूछ रही है —
यदि शासन के आदेश तीन माह के वितरण के हैं, तो दो माह का राशन किस आधार पर बांटा जा रहा है?
Pos मशीन के स्थान पर हस्तलिखित पर्ची क्यों दी जा रही है?
अगर भंडारण की समस्या है, तो उसकी सूचना क्यों नहीं दी गई?
क्या यह पूरी प्रक्रिया किसी संभावित "भंडारण आधारित खाद्यान्न घोटाले" की भूमिका है?




