रीवा में खाद घोटाले का विस्फोटक खुलासा: डीएपी की बोरी में मिला 'मिलावट का ज़हर', अन्नदाता के साथ करोड़ों की ठगी, प्रशासन मौन!
✍🏻 विंध्य वसुंधरा समाचार की विशेष रिपोर्ट
रीवा जिला एक बार फिर सुर्खियों में है – इस बार वजह है किसानों की पीठ में छुरा घोंपने वाला एक सुनियोजित खाद घोटाला, जिसने न केवल कृषि उत्पादन को झटका दिया, बल्कि शासन-प्रशासन की मिलीभगत या घोर लापरवाही को भी बेनकाब कर दिया।
चोरहटा थाना पुलिस द्वारा किए गए खुलासे में यह सामने आया है कि सैकड़ों टन मिलावटी डीएपी खाद रीवा, मऊगंज सहित आसपास के जिलों और प्रदेशों (छत्तीसगढ़, बिहार) में खपाई गई है। इस अवैध कारोबार में प्राइवेट कंपनियों की बोरियों में सस्ती सुपर फास्फेट खाद मिलाकर किसानों को ठगा गया। यह पूरा नेटवर्क अब भी सक्रिय है — और प्रशासन खामोश है।
₹400 की नकली खाद ₹1500 में, किसानों के खून-पसीने की लूट
जानकारी के अनुसार, जिन खाद बोरियों की वास्तविक कीमत ₹400 से ₹500 थी, उन्हें डीएपी के नाम पर ₹1200 से ₹1500 प्रति बोरी बेचा गया। खाद के नकलीपन से फसलें प्रभावित हुईं, उपज घटी, और किसान कर्ज के दलदल में फंस गए। इससे न केवल किसान बर्बाद हुए, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को भी सीधा खतरा पैदा हुआ।
12 अवैध मिलावटखोरी गोदामों की पहचान, कृषि विभाग गहरी नींद में
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, रीवा और मऊगंज में कम से कम 12 ऐसे अवैध गोदाम संचालित हो रहे हैं, जहां मिलावटी खाद तैयार की जाती है। इन गोदामों में सुपर फास्फेट को डीएपी की बोरियों में भरा जाता है, और फिर POS मशीनों के माध्यम से उसे "कानूनी रूप" देकर बेचा जाता है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि इन गोदामों की जानकारी कृषि विभाग, राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन को पहले से है। फिर भी अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई। क्या यह केवल लापरवाही है, या किसी सत्ताधारी संरक्षक का संरक्षण?
गोपनीय जांच और POS मशीनों की ऑडिट जरूरी
हर खाद वितरण POS मशीनों से दर्ज होता है। सवाल यह है कि क्या पिछले दो वर्षों में इन मशीनों की कोई स्वतंत्र जांच हुई?
किन किसानों के नाम पर कितनी खाद दर्ज की गई?
क्या वह खाद वास्तव में दी गई या कागजों में दिखाकर अवैध रूप से बेची गई?
यह भी जांच का विषय है कि आखिर इतने वर्षों से यह माफिया कैसे खुलेआम फलता-फूलता रहा।
राजनीतिक संरक्षण की बू, चुनावी अन्नदाता आज ठगा हुआ महसूस कर रहा
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ये अवैध कारोबारी राजनीतिक रसूखदारों के संरक्षण में काम कर रहे हैं। यही कारण है कि वर्षों से इनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई, और जब प्रिंट मीडिया एवं डिजिटल मीडिया सहित कई यूट्यूबर न्यूज चैनलों में खबर प्रमुखता के साथ चलाई गई तब जा कर खुलासा हुआ तब भी प्रशासन ने खानापूर्ति से अधिक कुछ नहीं किया।
विंध्य वसुंधरा समाचार ने पूर्व में प्रमुखता के साथ कई बार नकली खाद की खबर प्रकाशित कर चुका है किंतु अब जाकर कुछ कार्रवाई करने में प्रशासन विवश हो रहा है
क्या यह अन्नदाता का सम्मान है? क्या यह "रामराज्य" में भ्रष्टाचार का अंत है?
प्रशासन और संभागीय आयुक्त से पाँच बड़ी माँगें
1. 12 अवैध गोदामों पर तत्काल छापा और संपूर्ण स्टॉक की जब्ती।
2. पिछले दो वर्षों के POS खाद वितरण की स्वतंत्र जांच।
3. जिन अधिकारियों की जानकारी में यह सब हुआ, उन पर निलंबन।
4. मिलावट करने वाली कंपनियों के लाइसेंस रद्द और FIR दर्ज।
5. सभी प्रभावित किसानों को सरकारी मुआवजा और वैध खाद की आपूर्ति।
यह केवल मिलावट नहीं, यह अन्नदाता के विश्वास की हत्या है
रीवा और मऊगंज के किसान आज सिर्फ खाद से नहीं, बल्कि तंत्र से भी ठगे गए हैं।
अगर आज भी प्रशासन जागा नहीं, तो कल को यही माफिया बीज, कीटनाशक, बिजली और सिंचाई तक को जहर में बदल देंगे।
अगर सरकार में नैतिकता है, और प्रशासन में ईमानदारी बची है — तो इस खुलासे के बाद कार्रवाई होनी ही चाहिए।
वरना जनता यही मानेगी कि यह पूरा खेल सत्ता के संरक्षण में खेला जा रहा है।
