गोशाला केवल कागजों में, सड़कों पर गौवंश तड़पते-मरते रीवा मऊगंज में ‘गौ-संवर्धन’ योजना की पोल खुली
दरबार ढाबा के पास दो गौवंश मृत, एक गंभीर रूप से घायल न पशु विभाग जागा, न एमपीआरडीसी!
(विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मऊगंज मध्यप्रदेश)
"गौ-संवर्धन" के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करने वाली सरकार के लिए मऊगंज से आई ये तस्वीरें एक करारा तमाचा हैं। दरबार ढाबा के पास दो गौवंश मृत अवस्था में पड़े रहे और एक गंभीर रूप से घायल गाय घंटों तड़पती रही, लेकिन न पशु चिकित्सा विभाग के कर्मचारी पहुंचे, न ही नगरपालिका की कोई एंबुलेंस। यहां तक कि सड़क निर्माण की जिम्मेदारी संभाल रही एमपीआरडीसी तक ने चुप्पी साध रखी है।
सड़कों पर बिखरे जीवन और लहू — कौन है ज़िम्मेदार?
दरबार ढाबा से लेकर मुख्य चौराहों तक, मऊगंज की सड़कें इस समय गोवंशों के लिए कब्रगाह बन चुकी हैं। वाहन चालकों और आम राहगीरों के लिए यह संकट बन चुका है। आये दिन हो रहे हादसों में न केवल वाहन क्षतिग्रस्त हो रहे हैं, बल्कि गोवंश की अकाल मौतें भी हो रही हैं। स्थानीय नागरिकों ने कई बार शिकायतें कीं, लेकिन प्रशासन की ओर से केवल आश्वासन ही मिले।
गौशाला चालू नहीं, फिर खर्च कैसे?
यहां सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस क्षेत्र की गौशाला के नाम पर लाखों रुपये का बजट स्वीकृत हुआ है, वह आज तक ग्राम पंचायत को विधिवत हस्तांतरित (हैंडओवर) ही नहीं हुई है। निर्माण एजेंसी और पंचायत के बीच ‘दावा और हकीकत’ का लंबा अंतराल है।
पंचायत स्तर पर इसके संचालन का दावा किया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि गौशाला पूरी तरह खाली है। न कोई गोवंश वहां मौजूद है, न ही किसी तरह की देखरेख की जा रही है। इसके बावजूद ऑनलाइन पोर्टल पर गौशाला में "गोवंश उपस्थित" दिखाए जा रहे हैं, और उपस्थिति के आधार पर राशि का आहरण भी किया जा रहा है।
पशु विभाग की चुप्पी, जवाब से बचते अधिकारी
जब इस पूरे प्रकरण को लेकर पशु चिकित्सा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर से सवाल पूछा गया, तो वे अपनी कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए। उनका यह व्यवहार इस बात की ओर संकेत करता है कि विभागीय स्तर पर कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है। सवाल यही उठता है कि जब न कोई गोवंश है, न ही गौशाला पूर्ण है, तो वेरिफिकेशन की प्रक्रिया किस आधार पर हो रही है?
फर्जी दस्तावेज, झूठे आंकड़े और ‘गौ-सेवा’ के नाम पर घोटाला!
गौशालाओं के नाम पर गांव-गांव फर्जी दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं, सेवा-संवर्धन के नाम पर नकली हाजिरी दर्ज हो रही है, और पैसा उन जानवरों के नाम पर निकाला जा रहा है जो अस्तित्व में ही नहीं हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि जिस देश में गाय को "माता" कहा जाता है, वहां उसे सबसे ज्यादा उपेक्षा और मौत की यातना झेलनी पड़ रही है।
प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता चरम पर
मऊगंज की सड़कों पर गोवंशों की तड़प, दुर्घटनाएं और मौतें अब प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता की मिसाल बन चुकी हैं। कोई योजना, कोई आपात सुविधा, कोई रेस्क्यू टीम सक्रिय नहीं है। जिम्मेदार अफसर या तो फाइलों में दबे हैं या मीटिंग्स में व्यस्त।
जनता का सवाल —
अगर गौशाला है तो गौवंश सड़कों पर क्यों?
और अगर गौवंश सड़कों पर हैं, तो गौशाला पर लाखों रुपये खर्च क्यों?
जब गायें मर रही हैं, तो पशु चिकित्सालय और नगरपालिका की ज़िम्मेदारी कहां है?
यह केवल गोवंशों की खबर नहीं — यह उस भ्रष्ट और असंवेदनशील सिस्टम की रिपोर्ट है, जहां "गौ-सेवा" एक कागजी धंधा बन चुकी है।

