तीन करोड़ की शास्ति भी न रोक सकी सुशील पटेल का अवैध खनन! — प्रशासनिक उदासीनता बनी माफियाओं की ढाल
हनुमना के गोपला गांव में खनिज माफिया बेलगाम, कलेक्टर के आदेश तक रद्दी कागज साबित हुए
विंध्य वसुंधरा समाचार मऊगंज/हनुमना।
रीवा संभाग के मऊगंज जिले में अवैध उत्खनन की एक सनसनीखेज तस्वीर सामने आई है, जिसने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तहसील हनुमना अंतर्गत ग्राम गोपला में फर्शी पत्थर और बोल्डर के अवैध उत्खनन के मामले में सुशील कुमार पटेल पिता श्री बृजकिशोर पटेल, निवासी गोपला, के खिलाफ खनिज विभाग ने 3 करोड़ रुपये से अधिक की शास्ति लगाई है।
लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी शास्ति के बावजूद अवैध खनन धड़ल्ले से जारी है, और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। क्या यह सीधे-सीधे मिलीभगत नहीं है?
शिकायत, जांच और खुलासा — फिर भी कार्रवाई नहीं!
इस पूरे मामले की शुरुआत ग्राम पंचायत गोपला की सरपंच श्रीमती शीला यादव द्वारा की गई शिकायत से हुई। शिकायत के आधार पर गठित तीन सदस्यीय जांच दल ने 25 फरवरी 2025 को मौके पर पहुंचकर खसरा नंबर 601/1, रकबा 13.003 हेक्टेयर भूमि का निरीक्षण किया।
जांच में चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए:
अवैध उत्खनन की कुल मात्रा 8550 घनमीटर आंकी गई
मौके पर 4000 घनमीटर मलबा पाया गया
16 घनमीटर फर्शी पत्थर पंचायत सरपंच की सुपुर्दगी में सौंपा गया
प्रारंभिक शास्ति ₹1.50 करोड़ लगाई गई, जो समय पर जमा न होने से बढ़कर ₹3,00,32,000 हो गई
जांच रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि यह खनन बिना वैध स्वीकृति और रॉयल्टी अदा किए किया गया, जो खनिज अधिनियम की धारा 21(5) का घोर उल्लंघन है।
कलेक्टर के आदेश की खुली अवहेलना, अधिकारी मौन
खनिज विभाग द्वारा आरोपी के विरुद्ध राजस्व वसूली प्रमाणपत्र (RRC) जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। इसमें आरोपी की चल-अचल संपत्ति की कुर्की के निर्देश भी कलेक्टर मऊगंज द्वारा स्पष्ट रूप से जारी किए गए।
लेकिन यहां से शुरू होती है प्रशासनिक निष्क्रियता की असली कहानी।
जिला कलेक्टर के स्पष्ट आदेशों की लगातार अवहेलना की जा रही है
न तो कुर्की की प्रक्रिया आगे बढ़ी, न ही एफआईआर दर्ज की गई
अधीनस्थ अधिकारी न तो स्थल निरीक्षण कर रहे हैं, न कोई प्रत्यक्ष कार्यवाही
ऐसा प्रतीत होता है जैसे मऊगंज में खनिज माफिया ही प्रशासन से ऊपर हो चुका है।
प्रशासनिक चुप्पी = संरक्षण? — जनता में गुस्सा, सवालों की बौछार
गांव और आसपास के क्षेत्रों में प्रशासन की इस चुप्पी को लेकर जनता में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है:
“जब कलेक्टर के आदेश की भी कोई कीमत नहीं, तो आम आदमी की फरियाद किस गिनती में आएगी?”
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह खनिज माफियाओं और अधिकारियों के बीच गठजोड़ का नतीजा है। जब 3 करोड़ की शास्ति लगने के बावजूद आरोपी खुलेआम खनन कर रहा है, तो सवाल उठता है — किसके भरोसे चल रहा है यह दुस्साहस?
जनप्रतिनिधियों और संगठनों की तीन सूत्रीय मांग:
1. आरोपी की चल-अचल संपत्ति की तत्काल कुर्की की जाए
2. एफआईआर दर्ज कर आरोपी की गिरफ्तारी की जाए
3. कलेक्टर के आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए
क्या सीएम हेल्पलाइन और प्रशासनिक आदेश अब महज दिखावा हैं?
यह मामला न केवल खनिज माफिया के बढ़ते दबदबे का प्रतीक है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि जिला प्रशासन कितना लाचार और जवाबदेही से मुक्त हो चुका है। सवाल यह भी उठता है कि अगर कलेक्टर के आदेशों पर ही अमल नहीं हो रहा, तो शासन के अन्य नियंत्रण तंत्रों की क्या भूमिका रह जाती है?
जनहित में मांग: हाई लेवल जांच हो, दोषियों को बर्खास्त कर भेजा जाए जेल
अब समय आ गया है कि मऊगंज जिला प्रशासन अपनी नींद से जागे और ऐसी घटनाओं पर कठोर निर्णय ले:
पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच हो
प्रशासनिक अधिकारियों की निष्क्रियता के लिए सस्पेंशन और विभागीय जांच हो
खनिज माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाकर उन्हें जेल भेजा जाए

