रीवा लोक निर्माण विभाग में करोड़ों का घोटाला उजागर – प्रभारी कार्यपालन यंत्री पर गंभीर आरोप, शासन को भारी आर्थिक क्षति
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
रीवा जिले के लोक निर्माण विभाग (विद्युत यांत्रिकी संभाग) में करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने आया है। आरोप है कि प्रभारी कार्यपालन यंत्री विवेक कुमार श्रीवास्तव ने निजी स्वार्थवश शासन के नियमों को दरकिनार कर विभाग को भारी आर्थिक क्षति पहुंचाई। प्राप्त दस्तावेज और शिकायतें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि विवेक कुमार श्रीवास्तव ने अपने कार्यकाल के दौरान न केवल विभागीय प्रक्रियाओं को पूरी तरह अनदेखा किया, बल्कि बिना वैधानिक स्वीकृति एवं तकनीकी अनुमोदन के कार्यों को स्वीकृत कर करोड़ों रुपये का अनुचित भुगतान भी किया।
नियमों की खुली धज्जियां: स्वीकृत सीमा से 10 गुना तक बढ़ाई राशि
सूत्रों के अनुसार, विद्युत यांत्रिकी संभाग के कार्यों को ठेके पर स्वीकृति देने में प्रभारी कार्यपालन यंत्री द्वारा विभागीय मापदंडों का घोर उल्लंघन किया गया। उन्होंने प्रोजेक्ट की स्वीकृत प्रशासनिक सीमा से 10 गुना तक राशि बढ़ाई, जबकि ऐसा कोई भी संशोधन केवल सक्षम प्राधिकरण की पूर्व अनुमति से ही संभव है।
मध्यप्रदेश शासन के लोक निर्माण विभाग, भोपाल के पत्र क्रमांक 1993 दिनांक 29.07.2019 में स्पष्ट निर्देश हैं कि प्रशासकीय स्वीकृति से अधिक राशि का व्यय किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद विवेक कुमार श्रीवास्तव द्वारा कार्य स्वीकृत कर राशि जारी कर दी गई।
मुख्य अभियंता कार्यालय, रीवा ने भी पत्र क्रमांक 1360 दिनांक 07.08.2020 में इन कार्यों की वैधता पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं और स्पष्टीकरण मांगा है। यह दर्शाता है कि कार्यों को बिना तकनीकी आधार एवं वैधानिक स्वीकृति के कराया गया।
निजी फर्मों को लाभ पहुंचाने का आरोप – रिश्वतखोरी की भी आशंका
आरोप है कि प्रभारी कार्यपालन यंत्री ने निजी स्वार्थवश अपनी पसंदीदा फर्मों को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की राशि जारी की। कई मामलों में भुगतान स्वीकृत राशि से कहीं अधिक किया गया, जबकि कार्यस्थल पर निर्माण की कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।
सूत्र बताते हैं कि विवेक कुमार श्रीवास्तव और संबंधित ठेकेदारों के बीच सांठगांठ कर मोटे कमीशन के लेनदेन की भी आशंका है। यह न केवल शासन की वित्तीय व्यवस्था के लिए घातक है, बल्कि विभागीय स्तर पर संगठित भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण भी है।
जनहित को भारी नुकसान – शासन की साख दांव पर
लोक निर्माण विभाग में सामने आया यह मामला केवल सरकारी धन की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह शासन की साख और जनता के हितों पर सीधा प्रहार है। करोड़ों की राशि, जो विकास कार्यों में लगनी थी, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस प्रकरण की तत्काल उच्चस्तरीय जांच नहीं की गई, तो विभागीय कार्यप्रणाली में और अधिक गिरावट आ सकती है।
रीवा जिले के इस बहुचर्चित भ्रष्टाचार मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार पर समय रहते लगाम न लगाई गई तो आमजन का शासन से भरोसा उठना तय है। शासन एवं प्रशासन को इस मामले में कठोर कार्यवाही कर मिसाल पेश करनी होगी, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी अपने कर्तव्य से विमुख होने का साहस न कर सके।

