❝पत्रकारिता या प्रपंच? मऊगंज में 'मोबाइल माफिया पत्रकारों' की बाढ़ — क्या प्रशासन सो रहा है?❞
पत्रकारिता की आड़ में चरित्र हनन, धमकी, दलाली और विद्वेष फैलाने वालों पर कार्रवाई की जरूरत
एक समय था जब पत्रकारिता को समाज का दर्पण और लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता था, लेकिन मऊगंज जिले में आज जो हो रहा है, वह उस पत्रकारिता का अपमान है। सैकड़ों की संख्या में मोबाइल और यूट्यूब के सहारे खुद को पत्रकार घोषित कर चुके लोगों का एक गिरोह आज समाज के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।
ये वे लोग हैं जो न पत्रकारिता का अर्थ जानते हैं, न उसकी मर्यादा। इन्होंने पत्रकारिता को निचले स्तर तक गिरा दिया है — जहां न प्रमाणिकता है, न भाषा की गरिमा, और न ही समाज के प्रति ज़िम्मेदारी।
पत्रकार नहीं, चरित्र हनन के ठेकेदार
मोबाइल लिए सड़क पर खड़े ये लोग कभी भी किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति, जनप्रतिनिधि, अफसर, डॉक्टर, शिक्षक या व्यापारी को टारगेट कर देते हैं। कैमरा ऑन करते हैं, अपशब्द बोलते हैं, गाली देते हैं, और फिर उसे "खुलासा" या "बड़ा पर्दाफाश" बताकर यूट्यूब पर डाल देते हैं। न FIR होती है, न साक्ष्य। लेकिन बदनामी फैल जाती है।
क्या यह पत्रकारिता है या फिर ब्लैकमेलिंग का नया रूप?
दलाली और राजनीतिक एजेंडों का अड्डा बने 'यू-ट्यूब पत्रकार'
इनमें से अधिकांश लोग राजनीतिक दलों के मुखौटा बने हैं। किसी का एजेंडा विपक्षी दलों को नीचा दिखाना है, तो कोई सत्ता पक्ष को बदनाम करने में लगा है। कुछ ने इसे सीधे-सीधे दलाली का ज़रिया बना लिया है — "वीडियो नहीं डालेंगे अगर विज्ञापन दे दो", "हमारे चैनल से जुड़े नहीं तो बदनाम कर देंगे" — यह खुली धमकी अब आम हो चुकी है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी का हो रहा है घोर दुरुपयोग
संविधान ने सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी दी है, लेकिन यह आज़ादी निरंकुश नहीं है। किसी की छवि बिगाड़ने, अपमानित करने, धर्म/जाति के नाम पर समाज को भड़काने या अफवाह फैलाने की छूट किसी को नहीं है।
यह शर्मनाक है कि ऐसे कथित "पत्रकार" न केवल संविधान का मजाक उड़ा रहे हैं, बल्कि पत्रकारिता को एक गाली बना रहे हैं।
रीवा की गौरवशाली परंपरा को किया कलंकित
रीवा की धरती हमेशा से साहसी, तथ्यनिष्ठ और ईमानदार पत्रकारों की जननी रही है। यहां के पत्रकारों ने कलम को कभी झुकने नहीं दिया, सत्ता से सवाल पूछे, जनहित को प्राथमिकता दी। लेकिन आज मऊगंज जिले में तथाकथित यूट्यूब पत्रकारों की बाढ़ ने इस गौरवशाली परंपरा को लांछित कर दिया है।
प्रशासन को अब मौन तोड़ना होगा
यह मामला अब केवल पत्रकारिता की गरिमा का नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था का है। ऐसे लोगों पर फर्जी पत्रकारिता, ब्लैकमेलिंग, आईटी एक्ट, चरित्र हनन और सार्वजनिक शांति भंग करने की धाराओं में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।
प्रशासन को यह तय करना होगा कि मऊगंज जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कौन पत्रकार हैं और कौन सिर्फ मोबाइल लिए "साइबर गुंडा" बनकर घूम रहे हैं।
क्या मां सरस्वती की शपथ लेकर अपशब्दों की बौछार करना पत्रकारिता है?
"हम पत्रकार हैं", यह कहकर किसी की प्रतिष्ठा पर कीचड़ उछालना, सार्वजनिक रूप से गालियां देना, बिना तथ्य किसी को भ्रष्ट या दलाल कहना, क्या यही आज का मीडिया बन चुका है?
अगर प्रशासन ने समय रहते इस पर सख्ती नहीं बरती तो वह दिन दूर नहीं जब समाज ऐसे फर्जी पत्रकारों से तंग आकर कानून को अपने हाथ में लेने को मजबूर होगा।


