रीवा में मादक तस्करी का बड़ा भंडाफोड़: दो ट्रकों से 5 कुंटल गांजा बरामद, उड़ीसा से आई खेप – रीवा बनता जा रहा गांजा माफियाओं का गढ़!
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश का रीवा जिला इन दिनों मादक पदार्थों की तस्करी का नया अड्डा बनता जा रहा है। पुलिस ने शनिवार रात एक बड़ी कार्रवाई में गांजा की भारी खेप जब्त की है, जिसने न केवल अपराधियों की सक्रियता, बल्कि पुलिस तंत्र की अंदरूनी संरचना पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रविवार को पुलिस कंट्रोल रूम में आयोजित पत्रकार वार्ता में एडिशनल एसपी आरती सिंह ने खुलासा किया कि विगत दो दिन पूर्व मुखबिर से सूचना मिली थी कि उड़ीसा से दो ट्रकों में भारी मात्रा में गांजा रीवा भेजा जा रहा है। सूचना मिलते ही विश्वविद्यालय थाना प्रभारी हितेंद्र नाथ शर्मा एवं उनकी टीम को सक्रिय किया गया। शनिवार देर रात अजगरहा बायपास के पास पुलिस ने ट्रकों को रोकने की कोशिश की, लेकिन एक ट्रक का चालक भागने की कोशिश करने लगा। पुलिस द्वारा पहले से की गई नाकेबंदी के कारण दोनों ट्रकों को आखिरकार पकड़ लिया गया।
जब ट्रकों की तलाशी ली गई, तो उनमें करीब 5 क्विंटल (500 किलो) गांजा बरामद हुआ, जिसकी बाजार में कीमत लगभग 31 लाख रुपए आंकी गई है। पुलिस ने दोनों ट्रक चालकों को गिरफ्तार कर लिया है और प्रारंभिक पूछताछ में खुलासा हुआ है कि यह माल उड़ीसा से लाया गया था, जिसे रीवा और आसपास के जिलों में खपाने की तैयारी थी।
सवालों के घेरे में रीवा: क्यों बन रहा है नशे का अड्डा?
रीवा में नशे के नेटवर्क की यह कोई पहली घटना नहीं है। गांजा, नशीली कफ सिरप, अवैध शराब — यह सब अब जिले की पहचान बनते जा रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि रीवा जिला अब "गांजा का ट्रांजिट हब" बनता जा रहा है, जहां माफियाओं के तार बाहरी राज्यों से जुड़े हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर भी उन्हें मजबूत संरक्षण प्राप्त है।
आश्चर्यजनक यह है कि ऐसी बड़ी खेप तभी पकड़ी जाती है जब कोई नया थाना प्रभारी कार्यभार संभालता है। इससे साफ है कि पूर्व में पदस्थ रहे अधिकारियों की भूमिका या तो निष्क्रिय रही या संदिग्ध। जब कार्रवाई होती है, तभी जाकर यह सच्चाई सामने आती है कि गांव-गांव में गांजा, सिरप और शराब खुलेआम बिक रही थी — और पुलिस या तो अनजान बनी रही या मूकदर्शक।
क्या पुलिस थानों में भी 'पोस्टिंग माफिया' सक्रिय हैं?
एक और गंभीर पहलू यह है कि भोपाल मुख्यालय द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद, रीवा के कई थानों पर अब भी सब-इंस्पेक्टर को प्रभारी बनाकर पदस्थ किया गया है, जबकि इन थानों पर निरीक्षक (इंस्पेक्टर) की नियुक्ति अनिवार्य थी। इस नीति का खुलेआम उल्लंघन यह दिखाता है कि थानों में पदस्थापना भी सिफारिश, पहुंच और संरक्षण से तय हो रही है, न कि योग्यता और आवश्यकता से।
यह चर्चा अब आम हो चली है कि कुछ अधिकारियों को 'खादी और खाकी' दोनों का आशीर्वाद प्राप्त है, जिसके बल पर वे बार-बार मनचाहे थानों में बने रहते हैं, और निरीक्षक वर्ग लाइन अटैच होकर बैठा रहता है। ऐसी व्यवस्था में अपराध के खिलाफ नीतिगत और निरंतर कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी नहीं तो और क्या है?
अब सवाल प्रशासन से – क्या सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस से नशा रुकेगा?
इस मामले से यह स्पष्ट है कि रीवा में नशे का धंधा केवल अपराधियों की चालाकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और संरक्षण का भी परिणाम है। जब तक माफियाओं के स्थानीय नेटवर्क, उनके संरक्षक, गोदामों और ट्रांजिट प्वाइंट्स की गहन जांच नहीं होगी, तब तक ऑपरेशन प्रहार या छिटपुट कार्रवाइयाँ सिर्फ दिखावा साबित होंगी।
प्रशासन को यह जवाब देना होगा:
उड़ीसा से आने वाले गांजा की खेप रीवा तक सुरक्षित कैसे पहुंच जाती है?
कौन लोग हैं जो इसे यहां से आगे खपाने की व्यवस्था करते हैं?
क्या कुछ थाने ऐसे हैं जहां नशे का धंधा 'कमाई का जरिया' बन चुका है?
क्या पुलिस महकमे में भी कुछ तत्व ऐसे हैं जो इस नेटवर्क को संरक्षण दे रहे हैं?
जनता सवाल पूछ रही है, जवाब चाहिए – अब दिखावटी नहीं, निर्णायक कार्रवाई हो
रीवा की जनता अब जानना चाहती है कि क्या प्रशासन इन मामलों में केवल प्रेस वार्ता कर इतिश्री कर लेगा? या फिर अब स्थायी, नीति आधारित, निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई की शुरुआत होगी?
यदि प्रशासन वाकई गंभीर है तो अब समय है कि:
पूरे नेटवर्क का खुलासा हो
अपराधियों के साथ-साथ संरक्षक तत्वों पर भी कार्रवाई हो
नशे के धंधे में लिप्त पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय हो
थानों में नियमविरुद्ध पदस्थापना की तत्काल समीक्षा हो




