शहडोल में बरसात बनी विनाश का कारण: जर्जर मकानों पर गिरी आसमानी आफ़त, प्रशासन ने पीड़ितों को ही बना दिया दोषी
सत्ता के गलियारों में गूंजती विकास की बातें जमीनी सच्चाई में तब्दील हुईं मलबे के ढेर में; जनता पर टूटा दुखों का पहाड़, जवाबदेही से बच रहे जिम्मेदार
विंध्य वसुंधरा समाचार शहडोल मध्यप्रदेश
शहडोल जिले में बीते दिनों हुई तेज बारिश ने नगर विकास और प्रशासनिक सतर्कता की सच्चाई को उजागर कर दिया। शहर और आसपास के क्षेत्रों में अनेक जर्जर मकान ध्वस्त हो गए, जिनमें गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार रहते थे। मगर सबसे दुखद पहलू यह रहा कि इन पीड़ित परिवारों को राहत देने के बजाय प्रशासन ने ‘अवैध निर्माण’ का हवाला देकर उनके आशियानों को ढहा दिया। जिन लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी की जमापूंजी से एक छत बनाई थी, अब वे खुले आसमान तले दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
जनता देती है टैक्स, बदले में मिलता है उपेक्षा और बर्बादी
शहडोल नगर निगम और नगर पंचायतें हर साल करोड़ों रुपये कर के रूप में जनता से वसूल करती हैं। इसके बावजूद मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है। कहीं जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं है, तो कहीं बारिश का पानी घरों में घुस रहा है। जो घर बारिश में गिरे, उनमें से कई को वर्षों से नवीनीकरण या सुरक्षा प्रमाणन नहीं मिला। सवाल यह है कि नगर निगम और नगरपालिका क्या सिर्फ टैक्स वसूली तक सीमित हैं? क्या उनकी कोई नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बनती?
क्या कर रहे थे जनप्रतिनिधि?
स्थानीय विधायक, सांसद, पार्षद और नगर अध्यक्ष आखिर कर क्या रहे हैं? जिन वार्डों में ये घटनाएं हुईं, वहां के प्रतिनिधियों ने समय रहते कोई निरीक्षण क्यों नहीं करवाया? क्या यह ज़िम्मेदारी केवल जनता की थी कि वे अपने घरों को सुरक्षित रखें, जबकि नगर प्रशासन विकास योजनाओं और जनहित में खर्च होने वाले बजट को सिर्फ फाइलों तक सीमित रखे?
आज जब लोगों का सब कुछ उजड़ गया है, तो कोई जनप्रतिनिधि न तो घटनास्थल पर पहुंचा, न ही पीड़ित परिवारों को राहत, राशन या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था दी गई। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि सत्ता की संवेदनहीनता का परिचायक भी है।
न्याय की मांग: शासन-प्रशासन जवाब दे
शहडोल के नागरिकों का यह सवाल अब केवल एक जिले का नहीं, पूरे प्रदेश की नीतियों और योजनाओं पर सवालिया निशान बन चुका है। आखिर क्यों हर प्राकृतिक आपदा में सबसे पहले गरीब और कमजोर वर्ग की ही बस्तियां उजाड़ी जाती हैं? क्या जर्जर भवनों की सूची पहले से नगर निगम के पास नहीं होती? क्या चेतावनी और विकल्प देने की बजाय सीधे बुलडोजर चलाना ही सरकार की ‘न्याय नीति’ बन गई है?
सनातन परंपरा में ‘जनता जनार्दन’ मानी गई है, लेकिन आज की सरकारों में यही जनता सबसे उपेक्षित है। सत्ता के सिंहासन पर बैठे नेताओं और अफसरों को याद रखना चाहिए कि कुर्सी जनता के भरोसे ही टिकती है, और जब यह भरोसा टूटता है, तो परिणाम किसी सुनामी से कम नहीं होते।
शहडोल की यह त्रासदी सिर्फ बारिश की आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक कुप्रबंधन, राजनीतिक उदासीनता और मानवता के ह्रास का प्रतीक बन चुकी है। अब समय आ गया
है जब मुख्यमंत्री कार्यालय स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप करे, जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो और पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा व पुनर्वास की ठोस व्यवस्था प्रदान की जाए।



