मोहन सरकार में गौवंशों की दुर्दशा: मनगवां में पांच गौमाताएं ट्रक से कुचली, इलाज तक नहीं मिला
प्रदेश में गौ-संवर्धन और गौ-रक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली मोहन सरकार की जमीनी हकीकत एक बार फिर रीवा जिले के मनगवां में सामने आई है। शनिवार तड़के करीब 3 बजे मनगवां के यूपी ढाबा के पास एक तेज रफ्तार ट्रक ने सड़क पर बैठे पांच गौवंशों को कुचल दिया। हादसा इतना भीषण था कि कई गायें गंभीर रूप से घायल हो गईं और घंटों तक दर्द से तड़पती रहीं। हैरानी की बात यह रही कि मौके पर नगर परिषद मनगवां के कर्मचारी पहुंचे तो जरूर, पर घायल गायों को कोई चिकित्सा सुविधा नहीं दी गई।
स्थानीय प्रशासन का अमानवीय रवैया
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना की सूचना तत्काल नगर परिषद और पुलिस को दी गई थी, लेकिन जब तक प्रशासन हरकत में आता, तब तक गायें सड़क पर खून से लथपथ तड़प रही थीं। नगर परिषद के कर्मचारी पहुंचे भी तो केवल औपचारिकता निभाकर लौट गए। न तो पशु चिकित्सक को बुलाया गया, न ही किसी एंबुलेंस की व्यवस्था की गई।
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मनगवां में वर्षों से बेसहारा गौवंश खुलेआम सड़कों पर घूमते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा और देखभाल को लेकर शासन-प्रशासन पूरी तरह उदासीन है। गौशालाओं के नाम पर केवल दिखावटी घोषणाएं होती हैं, जिनका लाभ इन निरीह जीवों को नहीं मिल रहा।
राजनीति में गाय, ज़मीनी हकीकत में उपेक्षा
प्रदेश में गायों के नाम पर राजनीति खूब होती है—चुनाव आते ही ‘गौमाता’ की रक्षा के बड़े-बड़े वादे गूंजने लगते हैं। पर जैसे ही सत्ता मिलती है, सब कुछ भुला दिया जाता है। मनगवां की यह हृदयविदारक घटना इसी दोहरे चरित्र की मिसाल है। सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि क्या यही है मोहन सरकार की गौ-संवर्धन नीति? जब गायें सड़कों पर लहूलुहान तड़प रही थीं, तब प्रशासनिक मशीनरी और जनप्रतिनिधि कहां थे?
सवाल उठाते नागरिक, कार्रवाई की मांग
घटना के बाद स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों ने प्रशासन से मांग की है कि—
घायल गौवंशों का तत्काल उपचार कराया जाए
संबंधित ट्रक चालक पर सख्त कानूनी कार्यवाही हो
मनगवां नगर परिषद की लापरवाही की जांच हो
स्थायी समाधान के लिए बेसहारा पशुओं की सुरक्षा को लेकर व्यापक रणनीति बने
सरकारी तंत्र पर उठते गंभीर सवाल
गौरतलब है कि मनगवां में एसडीएम कार्यालय, थाना, तहसील और नगर परिषद जैसे सभी प्रमुख कार्यालय मौजूद हैं, फिर भी ऐसी घटनाओं पर कोई तत्काल राहत नहीं मिलना गंभीर प्रशासनिक विफलता को उजागर करता है। गायों की दुर्दशा की तस्वीरें और वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिससे जनआक्रोश बढ़ता जा रहा है।
जब सरकारें धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर गौवंश की महत्ता को प्रचारित करती हैं, तो उन्हें उनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। यदि बेसहारा गायें सड़कों पर मरती रहेंगी और उन्हें प्रशासनिक संवेदनशीलता नहीं मिलेगी, तो यह न केवल सरकारी नीतियों की असफलता है, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदना की भी हार है।

