सुप्रीम कोर्ट सड़क सुरक्षा समिति ने लिया NH-30 पर हुए दर्दनाक हादसे का संज्ञान — मध्यप्रदेश शासन से 10 जुलाई तक तलब की विस्तृत रिपोर्ट
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा मध्यप्रदेश
रीवा जिले के त्योंथर- NH-30 मार्ग पर 5 जून 2025 को हुए भीषण सड़क हादसे — जिसमें एक ही परिवार के सात लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें चार मासूम बच्चे भी शामिल थे — को लेकर सुप्रीम कोर्ट कमेटी ऑन रोड सेफ्टी ने गंभीर संज्ञान लेते हुए मध्यप्रदेश शासन से विस्तृत जवाब मांगा है।
इस संबंध में समिति के सचिव श्री संजय मित्तल द्वारा 6 जून 2025 को मध्यप्रदेश शासन के मुख्य सचिव श्री अनुराग जैन को औपचारिक पत्र जारी कर राज्य सरकार से 10 जुलाई 2025 तक दुर्घटना की रिपोर्ट और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए उठाए गए ठोस उपायों की जानकारी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह निर्णय समिति के चेयरमैन जस्टिस अभय मनोहर सप्रे और सदस्य डॉ. निशी मित्तल की स्वीकृति से जारी किया गया है।
हादसे का संक्षिप्त विवरण:
समिति द्वारा भेजे गए पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यह घटना रीवा जिले में उस समय घटी जब सीमेंट की चादरें लदा एक भारी ट्रक, एक ऑटो-रिक्शा पर पलट गया। प्रेस रिपोर्टों के अनुसार पीड़ित प्रयागराज से गंगा स्नान कर लौट रहे थे। सभी मृतक एक ही परिवार के सदस्य थे।
समिति ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर खड़े किए सवाल:
पत्र में कहा गया है कि ट्रैफिक कानूनों के कमजोर प्रवर्तन, ओवरलोडिंग, ओवरस्पीडिंग और सड़क सुरक्षा उपायों की कमी ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति का प्रमुख कारण हैं। समिति ने अपेक्षा जताई है कि राज्य सरकार केवल जांच रिपोर्ट ही नहीं, बल्कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएं रोकने के लिए जमीनी और व्यवहारिक कदमों की रूपरेखा भी समिति के समक्ष प्रस्तुत करे।
सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता की शिकायत से खुली लापरवाही:
यह गंभीर पहल तब शुरू हुई जब एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने NH-30 की गंभीर इंजीनियरिंग खामियों, घटिया निर्माण गुणवत्ता और वर्षों से हो रही दुर्घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट समिति को भेजा था। शिकायत में बताया गया था कि सोहगी पहाड़ से त्योंथर तक का यह खतरनाक मार्ग वर्षों से मौत का जाल बना हुआ है, लेकिन शासन-प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
मांग: दोषियों पर हो कड़ी कार्रवाई, सड़क हो पुनः डिज़ाइन
शिकायतकर्ता ने समिति की सक्रियता पर आभार जताते हुए यह भी मांग की है कि निर्माण एजेंसियों, भ्रष्ट ठेकेदारों और लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। इसके साथ ही सड़क की इंजीनियरिंग जांच कराकर मानकों के अनुरूप पुनः डिज़ाइन और निर्माण कराया जाए। साथ ही स्पीड मॉनिटरिंग, रिफ्लेक्टिव साइनेज, ओवरलोड चेकिंग और CCTV ट्रैफिक निगरानी को अनिवार्य किया जाए।
यह पत्र अब सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि राज्य सरकार के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट स्तर पर जवाबदेही की चुनौती है। यदि 10 जुलाई तक संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया या वास्तविक सुधार नहीं हुए, तो मामला अदालत की सीधी निगरानी में भी आ सकता है। ऐसे में अब ज़रूरत है एक ईमानदार प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की, ताकि NH-30 मौत का रास्ता न बनकर सुरक्षित यात्रा मार्ग में बदल सके




