प्राइवेट स्कूलों में दौड़ रहे बगैर पहचान, बिना बीमा और फिटनेस के निजी वाहन — हादसे के बाद कौन होगा जिम्मेदार?
बोलोरो-बस हादसा सिर्फ दुर्घटना नहीं, बच्चों की सुरक्षा पर सिस्टम का तमाचा है!
विंध्य वसुंधरा समाचार मऊगंज/रीवा, मध्यप्रदेश 4 अगस्त 2025।
रॉयल गैलेक्सी होटल के पास हुए बस और बोलेरो हादसे में घायल बच्चों की चीखें अब सिर्फ परिवारों के घरों तक नहीं, बल्कि पूरे मऊगंज-रीवा जिले के प्रशासनिक गलियारों में गूंजनी चाहिए — मगर अफसोस, प्रशासन अभी भी गहरी नींद में सो रहा है।
इस हादसे ने बच्चों की सुरक्षा के नाम पर चल रही 'ढकोसली व्यवस्था' का पूरा नक्शा उजागर कर दिया है। जिस बोलेरो में मासूम छात्र बैठे थे, वह किसी स्कूल की स्वीकृत गाड़ी नहीं थी। स्कूल ने खुद को इस जिम्मेदारी से झटकते हुए कहा — "हमारी गाड़ी नहीं थी।"
प्रश्न ये है कि जब बच्चे आपके विद्यालय में पढ़ते हैं, तो आप ये जानने की कोशिश क्यों नहीं करते कि कौन उन्हें ला-जा रहा है? क्या बच्चों की सुरक्षा अब स्कूल की नहीं, केवल किस्मत की जिम्मेदारी बन गई है?
रिकॉर्ड किसके पास है? प्रशासन मौन, स्कूल बेखबर, और वाहन मालिक बेलगाम!
रीवा और मऊगंज जिले के सैकड़ों स्कूलों में ऐसे सैकड़ों निजी वाहन — बोलेरो, ऑटो, टेंपो, लोडिंग रिक्शा — बिना किसी लिखित अनुबंध, बिना बीमा, बिना फिटनेस और बिना
पुलिस वेरिफिकेशन के बच्चों को स्कूल पहुंचा रहे हैं।
इन वाहनों पर न तो स्कूल का नाम होता है, न चालक की पहचान, और न ही कोई जिम्मेदारी तय होती है।
क्या जिला प्रशासन के पास इसका रिकॉर्ड है कि किस स्कूल में कितने वाहन लगे हैं?
क्या परिवहन विभाग को पता है कि इन वाहनों के पास बीमा और परमिट हैं या नहीं?
और सबसे अहम — यदि कल को ऐसे ही किसी वाहन में दर्जनों बच्चों की जान चली जाए, तो दोषी कौन होगा?
हादसे के बाद पल्ला झाड़ना — यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है?
स्कूल प्रबंधन की ओर से बयान आया कि बोलेरो उनके विद्यालय की नहीं थी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आप नहीं जानते कि आपके बच्चे किन गाड़ियों से आते हैं? क्या आप उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई व्यवस्था रखते हैं?
सच्चाई यह है कि अधिकतर प्राइवेट स्कूल केवल पढ़ाई और फीस वसूली तक सीमित हो चुके हैं। बच्चों की सुरक्षा अब उनके लिए 'गैर-जिम्मेदाराना विषय' बन चुकी है।
ब्लैकमेलिंग और झूठे प्रचार के पीछे भी साजिश उजागर
इस हादसे को लेकर एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है — एक कथित यूट्यूबर, जो असल में एक बीमा एजेंट है, उसने इस घटना को स्कूल से जोड़कर सोशल मीडिया पर झूठी और सनसनीखेज खबर फैलाई।
इसका उद्देश्य था — स्कूलों को बदनाम कर बीमा के लिए ब्लैकमेल करना। ऐसे व्यक्ति जिले भर में भ्रम फैलाकर, स्कूलों पर दबाव बनाकर बीमा कार्य खुद से कराने की धमकी देता है।
जब बात नहीं बनती, तो झूठी खबर चला देता है — और प्रशासन तमाशबीन बनकर देखता रहता है!
अब सवाल नहीं, जवाब चाहिए!
अब वक्त आ गया है जब सवाल नहीं, सीधा जवाब चाहिए —
किस स्कूल में कौन-से वाहन अधिकृत रूप से लगे हैं, क्या जिला शिक्षा अधिकारी और परिवहन विभाग के पास इसका दस्तावेज है?
जिन वाहनों के पास परमिट, बीमा और फिटनेस नहीं है — उन्हें जब्त क्यों नहीं किया गया?
क्या अब भी कोई बड़ी जनहानि का इंतजार किया जा रहा है, जिससे सरकार “मुआवजा” देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ले?
जनता की मांग, प्रशासन का अब नहीं बच सकता बहाना!
अभिभावक समुदाय की मांग है कि —
1. हर स्कूल को अनिवार्य रूप से यह घोषित करना होगा कि उसके यहां कौन-कौन से वाहन, किस स्वीकृति और अनुबंध के तहत लगे हैं।
2. हर वाहन के ड्राइवर का पुलिस सत्यापन, वाहन का बीमा, फिटनेस प्रमाणपत्र सार्वजनिक रूप से स्कूल में चस्पा किया जाए।
3. निजी वाहन चलाने वाले मालिकों की सूची प्रशासन के पास हो और उनकी निगरानी की जाए।
4. जो स्कूल या वाहन इन मानकों को पूरा नहीं करते, उन पर तत्काल कार्यवाही हो।
अब अगर प्रशासन नहीं जागा तो...
यदि जिला प्रशासन अब भी गलतफेमी में पड़ा रहा, तो अगली दुर्घटना “विनाश” में बदलेगी और उसका दोष सिर्फ उस वाहन या स्कूल का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का होगा जो आंख मूंदे बैठा है।
बच्चों की सुरक्षा कोई “दया” नहीं — यह संवैधानिक, सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी है
अब यह जिम्मेदारी कौन निभाएगा — प्रशासन, विद्यालय, या आम जनता?
उत्तर तय करना है, वरना जवाबदेही इतिहास की तरह सिर्फ हादसों के बाद दर्ज होगी।










