रीवा में प्रशासनिक निष्क्रियता फिर बनी हादसे की वजह — गंभीरपुर में जर्जर भवन ढहने से वृद्धा घायल, प्रधानमंत्री आवास अब भी सिर्फ़ कागज़ों पर
गढ़/रीवा मध्यप्रदेश (विंध्य वसुंधरा समाचार)।
रीवा जिले के गंगेव जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत अगड़ाल के ग्राम गंभीरपुर में गुरुवार आधी रात को एक जर्जर कच्चा मकान भरभराकर गिर पड़ा। मलबे के नीचे दबने से एक वृद्धा घायल हो गईं, जिन्हें प्राथमिक उपचार के बाद घर लाया गया है। यह हादसा न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही की बानगी है, बल्कि उस नीतिगत विफलता की भी कहानी कहता है जहाँ गरीबों के लिए बनाई गई योजनाएँ फाइलों से बाहर ही नहीं निकल पातीं।
पीड़ित महिला के पति बालमुकुंद उपाध्याय ने बताया कि रात करीब 12 बजे वे अपनी पत्नी के साथ घर में सो रहे थे कि अचानक जोर की आवाज के साथ मकान का एक हिस्सा भरभरा कर गिर पड़ा। जब तक वे कुछ समझ पाते, उनकी पत्नी मलबे के नीचे दब चुकी थीं। आसपास के ग्रामीणों की मदद से उन्हें निकाला गया और तत्काल स्थानीय स्तर पर उपचार दिलाया गया।
"प्रधानमंत्री आवास के लिए बरसों से दौड़ रहे, लेकिन अब तक नहीं मिली स्वीकृति"
बालमुकुंद उपाध्याय ने आरोप लगाया कि उन्होंने कई वर्षों पहले प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन दिया था। स्थानीय सरपंच और सचिव द्वारा फोटो लिए गए, दस्तावेज जमा कराए गए, लेकिन अब तक कोई स्वीकृति नहीं मिली। "यदि समय रहते आवास की स्वीकृति मिल गई होती, तो शायद यह हादसा टल सकता था", उन्होंने कहा।
"पंचायत में भेदभाव और चहेतों को प्राथमिकता"
उपाध्याय का आरोप है कि पंचायत स्तर पर गहरी पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली चल रही है। सरपंच के करीबी लोगों को ही प्राथमिकता दी जाती है, जबकि वास्तविक ज़रूरतमंदों की लगातार उपेक्षा होती है। ऐसे मामलों में जब जान पर बन आए, तब जाकर प्रशासन हरकत में आता है — वह भी केवल जांच और बयानबाज़ी तक सीमित।
बरसात में मौत से रोज़ाना जूझ रहे ग्रामीण — गढ़ जनपद में कई भवन हादसे के मुहाने पर
गंभीरपुर की यह घटना कोई पहली नहीं है। इसी गंगेव जनपद पंचायत क्षेत्र के ग्राम गढ़ में भी हाल ही में एक तिराहे पर स्थित पुराने भवन में तेज़ बारिश के चलते पानी भर गया। घर आज भी कच्ची मिट्टी का है, उस पर केवल पॉलिथीन की चढ़ाई गई है। उस भवन में एक वृद्ध महिला निवास करती हैं, जो हर पल जान जोखिम में डालकर रह रही हैं।
इसी क्षेत्र में पिछले वर्ष भी जर्जर दीवार गिरने की घटना हो चुकी है, लेकिन इसके बाद भी प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यहां तक कि पारसी स्कूल जैसी पुरानी इमारतों के गिरने का खतरा लगातार मंडरा रहा है, मगर किसी अधिकारी ने अब तक निरीक्षण की ज़हमत तक नहीं उठाई।
"बारिश रुकने वाली नहीं — लेकिन तैयारियाँ शून्य"
पूरे भारत में इस समय मानसून चरम पर है। कई राज्यों और देशों में बारिश से जनहानि हो रही है, लेकिन वहीं दूसरी ओर रीवा जिले में प्रशासन अभी भी 'इंतज़ार' की निद्रा में बैठा है — जैसे किसी बड़े हादसे के बाद ही नींद खुलेगी। न तो वैकल्पिक व्यवस्थाएँ की जा रही हैं, न ही समय रहते कार्रवाई।
स्थानीय स्तर से लेकर जिला प्रशासन तक का यह रवैया दर्शाता है कि योजनाएँ सिर्फ़ घोषणाओं और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित हैं। वास्तविकता में ज़मीनी स्तर पर न कोई सर्वे होता है, न कोई जोखिम-प्रबंधन।
अब सवाल यह है कि...
क्या प्रशासन केवल बड़ी जनहानि के बाद ही जागेगा?
क्या प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम सिर्फ़ पोस्टर और प्रचार तक सीमित रहेंगे?
क्या गरीबों की जान की कीमत इस व्यवस्था में कुछ नहीं?
रीवा जिले के गढ़ क्षेत्र की यह घटनाएँ प्रशासनिक संवेदनहीनता का आईना हैं। यदि समय रहते इन पर कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में ऐसी दुर्घटनाएँ और अधिक जानलेवा साबित हो सकती हैं। ज़रूरत है तत्काल निरीक्षण, जर्जर भवनों की सूची, और प्राथमिकता के आधार पर आवास आवंटन की — ताकि किसी और बालमुकुंद की पत्नी को मलबे के नीचे दबकर अपनी जान जोखिम में न डालनी पड़े।




