देश में यूरिया संकट गहराया – आधे से भी कम रह गया स्टॉक, खरीफ फसलें संकट में
मध्यप्रदेश विंध्य वसुंधरा समाचार
देश में उर्वरक संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है। डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की किल्लत पहले से झेल रहे किसानों पर अब यूरिया संकट ने भी गहरा असर डाल दिया है। कृषि मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि यूरिया का स्टॉक पिछले साल की तुलना में 57 प्रतिशत घटकर आधे से भी कम रह गया है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में किसान यूरिया के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई दे रहे हैं। कई जगह तो गुस्साए किसानों ने गोदामों और वितरण केंद्रों पर हंगामा भी किया है।
यूरिया स्टॉक में भारी गिरावट
1 अगस्त 2025 को देश में यूरिया का क्लोजिंग स्टॉक केवल 37.19 लाख टन दर्ज किया गया।
पिछले साल इसी तारीख को यह स्टॉक 86.43 लाख टन था। यानी इस साल 49.24 लाख टन कम यूरिया किसानों के पास उपलब्ध है।
यह गिरावट एक सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि एक गंभीर आपूर्ति संकट की ओर संकेत करती है।
यूरिया की मांग क्यों बढ़ी?
इस साल देश में मानसून की बेहतर स्थिति ने किसानों को खरीफ फसलों की बुवाई के लिए उत्साहित किया।
- धान और मक्का जैसी अधिक यूरिया-आधारित फसलों का रकबा बढ़ा।
- वहीं, तिलहन और दालें जैसी कम यूरिया-आधारित फसलों का क्षेत्रफल घटा।
इस असंतुलन ने मांग और आपूर्ति के बीच गहरी खाई पैदा कर दी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते आपूर्ति नहीं सुधरी तो खरीफ उत्पादन प्रभावित होना तय है।
वैश्विक बाज़ार और चीन की भूमिका
यूरिया संकट का बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की उथल-पुथल है।
- मई 2025 में यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमत लगभग 400 डॉलर प्रति टन थी, जो अब बढ़कर 530 डॉलर प्रति टन हो गई है।
- चीन, जो भारत का बड़ा आपूर्तिकर्ता है, ने बीते महीनों भारत को यूरिया निर्यात पर रोक लगा दी थी।
- हालांकि, अब खबरें हैं कि चीन यह प्रतिबंध हटाने जा रहा है, लेकिन वहाँ से यूरिया आयात करने पर किसानों तक पहुँचने में एक से डेढ़ माह का समय लग सकता है।
इस बीच, जब तक आयातित यूरिया भारत पहुँचेगा, तब तक खरीफ की मुख्य बुआई का समय निकल चुका होगा।
घरेलू उत्पादन पर संकट की चोट
जहाँ एक ओर वैश्विक बाज़ार ने संकट को गहराया है, वहीं घरेलू उत्पादन भी सामान्य से कम है।
- रामागुंडम फर्टिलाइज़र और तालचेर उर्वरक संयंत्र में उत्पादन प्रभावित हुआ है।
- काकीनाडा स्थित नागार्जुन फर्टिलाइज़र ने यूरिया बनाने की बजाय ग्रीन अमोनिया का उत्पादन शुरू कर दिया है और उसका निर्यात कर रहा है।
इस नीति ने घरेलू बाजार में यूरिया की उपलब्धता और घटा दी है।
अन्य उर्वरकों की स्थिति भी चिंताजनक
यूरिया के साथ-साथ अन्य खादों का स्टॉक भी सामान्य से कम है –
- डीएपी (डाईअमोनियम फॉस्फेट): 13.90 लाख टन (पिछले साल 15.82 लाख टन)
- कॉम्प्लेक्स उर्वरक: 34.97 लाख टन (पिछले साल 46.99 लाख टन)
- एमओपी (म्यूरिएट ऑफ पोटाश): 6.27 लाख टन (पिछले साल 8.0 लाख टन)
- एसएसपी (सिंगल सुपर फॉस्फेट): 20.73 लाख टन (पिछले साल 20.06 लाख टन – हल्की बढ़ोतरी)
स्पष्ट है कि देश केवल यूरिया ही नहीं बल्कि अन्य उर्वरकों के मामले में भी चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है।
सरकार की नीति और सब्सिडी का सवाल
यूरिया एकमात्र ऐसा उर्वरक है जिसकी कीमत सरकार के नियंत्रण में रहती है।
- बिक्री मूल्य से अधिक लागत की पूरी भरपाई केंद्र सरकार सब्सिडी के माध्यम से करती है।
- अन्य उर्वरकों के लिए सरकार न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) देती है, जिनकी कीमत कंपनियां तय करती हैं।
इसके बावजूद यूरिया की भारी किल्लत यह संकेत देती है कि वितरण व्यवस्था और उत्पादन नीति दोनों स्तरों पर खामियां मौजूद हैं।
किसानों पर असर और आने वाला संकट
- किसानों को इस समय खेतों में टॉप ड्रेसिंग के लिए यूरिया की सबसे ज्यादा जरूरत है।
- कतारों में खड़े किसान कह रहे हैं कि अगर अगले कुछ हफ्तों में यूरिया नहीं मिला तो धान और मक्का जैसी फसलें मुरझा जाएँगी।
- उत्पादन घटने से न केवल किसानों की आय पर असर पड़ेगा बल्कि खाद्य सुरक्षा पर भी गहरा संकट आ सकता है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए तो देश को आगामी महीनों में खाद्यान्न आयात पर भी निर्भर होना पड़ सकता है।
यूरिया की यह किल्लत केवल एक मौसमी समस्या नहीं बल्कि वैश्विक बाज़ार, घरेलू उत्पादन और नीति-निर्माण की कमजोरियों का मिश्रित परिणाम है। किसानों के लिए यह संकट केवल खाद की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके पूरे सीजन की मेहनत और आमदनी दांव पर लगी है। सरकार के लिए यह स्थिति एक कठिन परीक्षा है, जिसमें त्वरित फैसले और ठोस कार्यवाही ही समाधान साबित होंगे।


