लोकतंत्र बनाम नशा माफिया : मोहरे जनता और पुलिस, असली खिलाड़ी सरकार!
रीवा में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज—लेकिन बड़ा सवाल सरकार से : उत्पादन बंद क्यों नहीं?
रीवा में घटित घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र की सबसे कमजोर कड़ी आम जनता ही है। नशा कारोबार के खिलाफ सबूत लेकर पहुंचे युवा प्रदर्शनकारियों का स्वागत हुआ लाठियों से। सवाल उठता है—क्या अब लोकतंत्र में सच बोलना और सवाल पूछना गुनाह है?
लाठियों से दबाई गई आवाज़
एनएसयूआई कार्यकर्ता हाथों में कोरेक्स की खाली शीशियाँ लिए एसपी कार्यालय पहुँचे। उनका मकसद साफ था—यह दिखाना कि शहर में आज भी कोरेक्स और अन्य नशीली दवाओं की सप्लाई धड़ल्ले से हो रही है।
लेकिन शांति और सवाल का जवाब मिला हिंसा से। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। जिन छात्रों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, उनके हाथों में लाठी के निशान छोड़ दिए गए।
👉 प्रदर्शनकारियों ने न तो कानून तोड़ा, न हिंसा की।
👉 वे सिर्फ यह पूछ रहे थे—“इतनी भारी मात्रा में कोरेक्स आती कहाँ से है?”
मोहरे जनता और पुलिस, असली खिलाड़ी सत्ता
लोकतंत्र की इस पटकथा में दोनों पक्ष मजबूर हैं।
पुलिस—कानून-व्यवस्था का हवाला देकर बल प्रयोग करती है।
जनता/प्रदर्शनकारी—संविधान प्रदत्त अधिकार का इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन असली खेल कहीं और चलता है।
गुनहगार वे ताकतवर लोग हैं जो सत्ता की चौखट पर बैठकर कंपनियों को इस प्रतिबंधित नशीली दवा का उत्पादन जारी रखने का लाइसेंस देते हैं।
सरकार का दोहरा चेहरा
काग़ज़ पर सरकार नशे के खिलाफ अभियान चलाती है।
जमीन पर वही सरकार कंपनियों को उत्पादन की इजाज़त देती है।
सवाल साफ हैं—
➡ अगर कोरेक्स प्रतिबंधित है तो उत्पादन क्यों जारी है?
➡ कंपनियों को लाइसेंस किसके संरक्षण में मिल रहे हैं?
➡ जब उत्पादन ही जारी रहेगा, तो नशे की सप्लाई रुकने का सवाल ही नहीं उठता।
लोकतंत्र पर लाठियों की चोट
संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है।
लेकिन जब जनता इस अधिकार का इस्तेमाल करती है तो पुलिस की लाठियाँ बरसती हैं।
👉 क्या यही लोकतंत्र है—जहाँ भ्रष्टाचारियों को संरक्षण और जनता को दमन?
👉 क्या यह वही व्यवस्था है जो जनता के कर से चलती है लेकिन जनता की आवाज़ दबाती है?
जनता बनाम सत्ता
रीवा की यह घटना केवल युवाओं पर हुए लाठीचार्ज तक सीमित नहीं है।
यह उस तंत्र की तस्वीर है जहाँ—
जनता और पुलिस आमने-सामने खड़ी कर दी जाती है।
असली सौदे सत्ता और कंपनियों के बीच तय होते हैं।
नशा माफिया पनपते हैं और नेता राजनीतिक लाभ उठाते हैं।
रीवा का यह लाठीचार्ज लोकतंत्र की परीक्षा है।
अगर सरकार सचमुच नशे के खिलाफ है तो पहला कदम होना चाहिए—कोरेक्स उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध।
जब तक उत्पादन जारी रहेगा, तब तक
हर अभियान,
हर बयान,
और हर लाठीचार्ज
सिर्फ एक दिखावा रह जाएगा।
जनता का सवाल
अब जनता सरकार से सीधे सवाल पूछ रही है—
👉 क्या सरकार नशे के खिलाफ है या फिर नशे की राजनीति के साथ?
👉 क्या लाठियाँ जनता के लिए और संरक्षण माफियाओं के लिए है?
👉 क्या यह लोकतंत्र है या फिर सत्ता और माफियाओं का गठजोड़?

