क्या यही था रीवा की जनता का सपना? सत्ता बदलते ही अपराधियों का राज, जनता बेबस
रीवा, 23 अगस्त 2025।
कभी विंध्य प्रदेश की राजधानी रह चुका रीवा आज मध्यप्रदेश का संभागीय मुख्यालय है। यह क्षेत्र न सिर्फ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए जाना जाता है, बल्कि वर्तमान समय में बड़े गौरव की बात यह है कि रीवा से चुने गए विधायक प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी स्वयं को संस्कार और संगठन आधारित विचारधारा वाली पार्टी बताती है। परंतु आज सत्ता की मजबूरियों और राजनीतिक समझौतों के चलते हालात बिल्कुल अलग दिखाई दे रहे हैं। विपक्ष में रहते हुए जो नेता कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ आंदोलनों, धरना-प्रदर्शनों और चक्काजाम का नेतृत्व करते थे— वही आज उन्हीं दलों से जुड़े नेताओं और कारोबारियों को सत्ता की चाबी सौंप चुके हैं।
अवैध कारोबारियों की मौज, प्रशासन मौन
रीवा जिले की तस्वीर आज चिंताजनक है। जिस इलाके में लकड़ी, चंदन और खनिजों के अवैध व्यापारियों के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ता कभी सड़क पर उतरते थे, सत्ता परिवर्तन के बाद वही चेहरे अब सत्ता के करीबियों में शामिल हो गए हैं।
कभी आरोपी कहे जाने वाले लोग अब नेताओं के साथ मंच साझा कर रहे हैं।
पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सत्ता के दबाव में हाथ बांधकर खड़े नजर आते हैं।
हालात यह हैं कि नशे के बड़े कारोबारी, जिनके पारिवारिक संबंध सत्ता के शीर्ष नेताओं से जुड़े हैं, खुलेआम शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं— गोलियां लहराते हैं, अपने घरों को ‘सरकारी कार्यालय’ जैसा घोषित कर देते हैं।
जनता की सुरक्षा दांव पर
रीवा और आसपास के क्षेत्रों में बढ़ते अपराधों ने आम नागरिकों का जीना दूभर कर दिया है।
घरों में चोरी की घटनाएं आम हो चुकी हैं।
सड़कों पर लूटपाट और राहगीरों से छिनैती की खबरें आए दिन सामने आती हैं।
लोग यात्रा पर निकलते हैं तो यह भरोसा नहीं रह गया कि वे सुरक्षित घर लौट पाएंगे।
यानी जनता का विश्वास प्रशासन और शासन दोनों से उठता जा रहा है।
बीजेपी कार्यकर्ताओं की पीड़ा—क्या यही सपना था?
पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष राजेंद्र पांडे, वरिष्ठ नेता चंद्रमणि त्रिपाठी और अन्य कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में वर्षों तक आंदोलन करने वाले लोग आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
आंदोलन की यादें आज भी थानों के रिकॉर्ड में दर्ज हैं।
जिन कार्यकर्ताओं ने नशे, अवैध खनन और अपराध के खिलाफ लड़ाई लड़ी, वही आज तड़प रहे हैं।
जो कार्यकर्ता अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनकी आत्माएं शायद ऊपर से यह सोचकर हंस रही होंगी कि अगर यही परिणाम होना था तो आंदोलन क्यों किया? हम भी सत्ता का सुख लेते और सत्ता परिवर्तन के बाद आसानी से अपने पाले बदल लेते।
पार्टी की आत्मा पर सवाल
भाजपा हमेशा से संस्कार और विचारधारा की बात करती आई है। लेकिन सवाल उठ रहा है—
क्या सत्ता की राजनीति में सिद्धांतों को ताक पर रख दिया गया है?
क्या जनता के विश्वास और कार्यकर्ताओं के संघर्ष का यही प्रतिफल है कि अपराधी सत्ता की छत्रछाया में फल-फूल रहे हैं?
क्या यही वह रीवा है, जिसके लिए आंदोलन और बलिदान दिए गए थे?
ताजा विवाद और पार्टी के भीतर आक्रोश
रीवा-सीधी इलाके से भारतीय जनता पार्टी के कुछ पदाधिकारियों पर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में पार्टी के एक पदाधिकारी के खिलाफ मोटरसाइकिल विवाद की शिकायत दर्ज कराई गई है। यह प्रकरण अभी जांच के अधीन है, लेकिन इसे लेकर कार्यकर्ताओं और जनता में भारी चर्चा है।
रीवा आज विकास की राह पर जितना तेजी से दौड़ना चाहता है, अपराध और सत्ता संरक्षण की सियासत उसे उतना ही पीछे खींच रही है। भाजपा के मूल सिद्धांतों और संगठन की आत्मा पर जो सवाल आज खड़े हो रहे हैं, यदि उनका समाधान नहीं निकाला गया तो यह न सिर्फ पार्टी की साख के लिए बल्कि जनता के विश्वास के लिए भी खतरनाक साबित होगा।
देखना होगा कि भोपाल के बाद रीवा जिले में पनप रही मछली जो मगरमच्छों का रूप ले चुकी है। उन पर कब कार्यवाही होगी जो राजनीतिक संरक्षण के आड़ में अवैध नशे के कारोबार में संलिप्त है।

