ग्राम स्वराज का सपना या सेवा शुल्क का खेल? पंचायतों में फैलता भ्रष्टाचार, अधूरे विकास कार्य और जनता के विश्वास पर चोट
भारत की आज़ादी के बाद महात्मा गांधी ने जिस ग्राम स्वराज की कल्पना की थी, वह इस सोच पर आधारित थी कि गांव आत्मनिर्भर बनेंगे, पंचायतें जनता की भागीदारी से कार्य करेंगी और लोकतंत्र की जड़ें गांव-गांव तक मज़बूत होंगी। लेकिन आज की स्थिति इन आदर्शों से बिल्कुल विपरीत है। मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के अधिकांश हिस्सों में पंचायत व्यवस्था में भ्रष्टाचार और निजी स्वार्थ की गहरी पैठ बन चुकी है।
मजदूरों के नाम पर मशीनें
सरकारी योजनाओं का सबसे बड़ा उद्देश्य गांवों में रोजगार सृजन और विकास कार्य था। लेकिन पंचायतों में फाइलें मजदूरों के नाम पर तैयार होती हैं, जबकि कार्य मशीनों से कराया जाता है।
जहां 100 मजदूर दिनभर काम कर सकते हैं, वही काम मशीनें महज़ दो घंटे में निपटा देती हैं। परिणामस्वरूप न तो मजदूरों को रोजगार मिलता है और न ही कार्य की गुणवत्ता बनी रहती है।
25 साल से अधूरा भवन : व्यवस्था की पोल
रीवा जिले की ग्राम पंचायत गढ़ में जिला पंचायत सदस्य की सिफारिश पर स्वीकृत भवन का निर्माण पिछले 25 वर्षों से अधूरा पड़ा है। आज तक उसकी बाउंड्री तक पूरी नहीं हुई। शासन की ओर से राशि स्वीकृत और खर्च दर्शाई गई, लेकिन जमीन पर परिणाम शून्य है। सवाल यह है कि क्या यह केवल सरपंच की लापरवाही है या फिर अफसरों, इंजीनियरों और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत?
शिकायतें नेताओं तक, कार्रवाई फाइलों में
गांव के लोग शिकायतें जनपद, जिला पंचायत, यहां तक कि विधायक और सांसद तक पहुंचाते हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन मिलता है। विधानसभा और लोकसभा तक इन मुद्दों पर प्रश्न तक नहीं उठाए जाते। यह चुप्पी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का सबसे बड़ा कारण है।
सेवा शुल्क का खुला खेल
गांवों में पानी के टैंकर, यात्री प्रतीक्षालय, मिट्टी सड़क, नल-जल योजना और नाली उत्खनन जैसे कामों में कमीशनखोरी आम चर्चा का विषय है। गांव का कोई भी चौक-चौराहा इस बात का गवाह है कि लोग ‘सेवा शुल्क’ या ‘कमीशन’ की बातें खुलेआम करते हैं।
हालांकि दबाव और डर के कारण कोई भी व्यक्ति अपना नाम और चेहरा सामने लाने को तैयार नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार की सच्चाई सबको मालूम होते हुए भी वह “जनचर्चा” तक सीमित रह जाती है।
ऑडियो-वीडियो बने सबूत, पर सरकार खामोश
हाल ही में पंचायत स्तर पर सेवा शुल्क बंटवारे से जुड़े कुछ ऑडियो और वीडियो सामने आए हैं। इनमें साफ तौर पर ग्रामीण और सरपंच के बीच पैसों की लेन-देन की चर्चा दर्ज है।
हालांकि, कानूनी दृष्टि से किसी की निजी बातचीत की रिकॉर्डिंग अपराध की श्रेणी में आती है, लेकिन इन सामग्रियों ने जनता के बीच यह विश्वास और मजबूत किया है कि भ्रष्टाचार केवल अफवाह नहीं बल्कि कड़वी सच्चाई है।
जांच एजेंसियों की निष्क्रियता
जनता को विश्वास था कि भाजपा सरकार कांग्रेस शासनकाल के भ्रष्टाचार की परतें खोलकर पारदर्शिता लाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि न तो ईडी, न सीबीआई और न ही कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी ऐसे मामलों में संज्ञान ले रही है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब कानून बनाने वाले खुद आरोपों के घेरे में हों, तो निष्पक्ष जांच कौन करेगा?
लोकतंत्र और जनता के विश्वास पर चोट
गांवों की यही तस्वीर लोकतंत्र की असली खूबसूरती पर ग्रहण लगा रही है। यदि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूलकर केवल निजी लाभ के लिए काम करेंगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा आघात होगा।
जनता ने बहुत उम्मीदों के साथ सरकार बदली थी कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, लेकिन स्थिति उल्टी साबित हो रही है। परतें खुलने की बजाय भ्रष्टाचार की परतें और मोटी होती जा रही हैं।

