Breaking:// हिनौती में श्रीमद भागवत कथा का पाँचवाँ दिन महर्षि दधीचि का अस्थिदान – मानव जीवन का लक्ष्य केवल लोककल्याण होना चाहिए
रीवा जिले के हिनौती स्थित चियार शारदा देवी मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद भागवत महापुराण कथा का पाँचवाँ दिन आध्यात्मिक वातावरण से ओतप्रोत रहा। कथा व्यासपीठ पर विराजमान आचार्य रमाशंकर दास महाराज ने पाँचवें स्कंध का गहन विवेचन करते हुए कहा कि भागवत का प्रत्येक स्कंध केवल कथा नहीं, बल्कि एक दिव्य दार्शनिक संदेश है।
उन्होंने बताया कि –
पाँचवाँ स्कंध भगवान विष्णु की नाभि,
छठा स्कंध वक्षस्थल,
और सातवाँ व आठवाँ स्कंध जंघा के रूप में वर्णित हैं।
यह आयोजन स्वामी देवानंद शास्त्री महाराज के 108 श्रीमद भागवत कथा संकल्प के अंतर्गत 55वाँ भागवत कथा महायज्ञ है, जो पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण कर रहा है।
पिछले चार दिनों की कथा का सार
आचार्यजी ने स्मरण कराया कि अब तक हुए चार दिनों में श्रद्धालुओं ने श्रीमद भागवत महात्म्य, भगवान विष्णु के 24 अवतारों की कथा, ब्रह्मा की उत्पत्ति, नारद मुनि के पूर्वजन्म, राजा परीक्षित के प्रश्न, शौनकादि ऋषियों और शुकदेव संवाद, सृष्टि-क्रम, भक्त ध्रुव और प्रह्लाद चरित्र जैसे प्रेरक प्रसंगों का श्रवण किया।
महर्षि दधीचि: भारतीय संस्कृति की अनूठी धरोहर
कथा के पाँचवें दिन आचार्यजी ने महर्षि दधीचि के अस्थिदान प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि –
भारतीय संस्कृति में ऐसे ऋषि-मुनियों ने जन्म लिया जिन्होंने लोककल्याण को सर्वोच्च लक्ष्य मानकर अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
दधीचि ने वृत्तासुर जैसे असुर के विनाश हेतु देवताओं को अपनी अस्थियाँ दान कीं, जिससे वज्र अस्त्र का निर्माण हुआ।
यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि त्याग और लोककल्याण की पराकाष्ठा है, जो हमें सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सुख नहीं, बल्कि समाज और सृष्टि का हित होना चाहिए।
आचार्यजी ने प्रश्न किया – “दधीचि जैसे महात्यागी ऋषि अन्य संस्कृतियों में क्यों नहीं मिलते?”
उत्तर में उन्होंने कहा – क्योंकि भारत की सनातन संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ प्रत्येक जीव में उसी एक ब्रह्म का दर्शन किया जाता है। यही दृष्टि भारतीयता को अद्वितीय बनाती है।
देवराज इंद्र – शक्ति के दुरुपयोग का प्रतीक
कथा में बताया गया कि यद्यपि इंद्र देवताओं के राजा कहे जाते हैं, परन्तु उनका चरित्र एक ऐसे शासक का प्रतीक है जो –
इन्द्रियों के वशीभूत होकर भोग-विलास में डूबा रहता है।
अर्जित शक्तियों का दुरुपयोग करता है।
और अपनी कमजोरियों के कारण उपहास का पात्र बनता है।
आचार्यजी ने कहा कि समाज और राजनीति में आज भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ शासक स्वार्थवश निर्णय लेकर अपनी छवि धूमिल कर लेते हैं। यह प्रसंग हमें चेतावनी देता है कि सच्चे शासक को संयम, त्याग और जनहित के गुणों से संपन्न होना चाहिए।
आध्यात्मिक संदेश – योग का सार समत्व में
श्रीमद्भागवत और गीता का सार बताते हुए कहा गया कि जब मानव यह समझ लेता है कि हर जीव उसी परमात्मा की संतान है, तब वह समभाव से सबको देखता है। यही योग है – “समत्वं योग उच्यते।”
महर्षि दधीचि का त्याग इसी योग और समभाव का सर्वोच्च उदाहरण है।
विशेष उपस्थिति और आयोजन का आकर्षण
30 अगस्त की कथा में त्यौंथर के पूर्व विधायक श्यामलाल द्विवेदी पधारे। उन्होंने कथा का श्रवण किया और आचार्यगणों से आशीर्वाद प्राप्त किया।
पूरे प्रांगण में भक्ति-भाव, भजन और श्रद्धा का अद्वितीय संगम दिखाई दिया।
समापन की तैयारियाँ
आयोजक मंडल ने जानकारी दी कि यह श्रीमद भागवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ 2 सितंबर 2025 को विशाल हवन एवं भंडारे के साथ संपन्न होगा।
सभी श्रद्धालुओं से कथा श्रवण करने और प्रसाद ग्रहण कर पुण्यलाभ अर्जित करने का आग्रह किया गया है।




