हिनौती स्कूल मध्यान्ह भोजन में घोटाला: राजनीति की भेंट चढ़े बच्चों के निवाले
विधायक–जनपद अध्यक्ष पर पक्षपातपूर्ण हस्तक्षेप के आरोप, 14 वर्षों से पुराने समूहों का दबदबा बरकरार
स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट विंध्य वसुंधरा समाचार| रीवा, 23 अगस्त 2025
रीवा जिले के गंगेव जनपद अंतर्गत शासकीय माध्यमिक एवं प्राथमिक कन्या/बालक शाला हिनौती में मध्यान्ह भोजन (Mid-Day Meal) की व्यवस्था इन दिनों राजनीतिक घमासान का अखाड़ा बनी हुई है। बच्चों को पोषण देने की बजाय यह योजना नेताओं, स्कूल प्रशासन और स्व सहायता समूहों के बीच रस्साकशी का माध्यम बन चुकी है।
जय अंबे और रागिनी महिला स्व सहायता समूह ने आरोप लगाया है कि शासन द्वारा भोजन वितरण की जिम्मेदारी उन्हें आवंटित किए जाने के बावजूद, स्कूल प्रशासन मनमानी करते हुए पुराने समूहों रमा और साई बाबा से भोजन बनवा रहा है। इन समूहों की पकड़ पिछले 14 वर्षों से अंगद के पाँव की तरह जमी हुई है।
पीटीए से लेकर स्व सहायता समूह तक: व्यवस्था में गड़बड़ी का सफर
वर्ष 2019 में एक शाला–एक परिसर नीति के तहत मध्यान्ह भोजन की जिम्मेदारी अस्थायी तौर पर पीटीए (पालक–शिक्षक संघ) को दी गई थी। इस दौरान भी स्कूल प्रशासन ने मनमर्जी से रमा एवं साईं बाबा समूहों को कॉन्ट्रैक्ट पर काम सौंप दिया।
वर्ष 2023–24 में शासन ने नया आदेश जारी कर भोजन व्यवस्था पुनः महिला स्व सहायता समूहों को देने के निर्देश दिए। इसके तहत ग्राम पंचायत सेदहा ने जय अंबे और रागिनी समूहों से अनुबंध किया। इन समूहों के खाते में धनराशि भी जमा हुई, लेकिन खाद्यान उठाव की जिम्मेदारी प्राचार्य सुखराम कोल ने अपने नियंत्रण में रखी और पुरानी व्यवस्था जारी रखते हुए अनाज उन्हीं पुराने समूहों को थमाते रहे।
सीईओ का आदेश, लेकिन फाइलों पर जमी धूल
18 अगस्त 2025 को सीईओ जिला पंचायत रीवा ने स्पष्ट निर्देश जारी कर रागिनी और जय अंबे समूहों को भोजन व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपने के आदेश दिए। इसके बावजूद मनगवां विधायक नरेंद्र प्रजापति और जनपद अध्यक्ष गंगेव विकास तिवारी पर दबाव बनाने और फाइलें रोककर रखने के आरोप लगे हैं।
नए समूहों का कहना है कि दोनों नेता चाहते हैं कि पीटीए के माध्यम से ही पुरानी व्यवस्था चालू रहे, ताकि रमा और साई बाबा समूहों को फायदा मिलता रहे।
विवादित पात्रता: आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की मां अध्यक्ष!
रमा स्व सहायता समूह की अध्यक्ष कलावती सिंह बताई जाती हैं, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता रंजना सिंह की मां हैं। आरोप है कि उनकी आयु 60 वर्ष से अधिक है और वे समूह की पात्रता के दायरे में भी नहीं आतीं। इसके बावजूद 14 वर्षों से अध्यक्ष पद पर काबिज रहकर लाभ उठाया जा रहा है।
स्व सहायता समूह की अवधारणा पर प्रश्नचिन्ह
स्व सहायता समूहों का उद्देश्य महिलाओं को हर 3 वर्ष में अवसर देकर आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन हिनौती स्कूल का मामला दिखाता है कि राजनीतिक संरक्षण में कुछ समूह सालों–साल कब्जा जमाए बैठे हैं। इससे शासन की मंशा और नीति दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बच्चों के निवाले पर गिद्ध दृष्टि
प्रदेश के कई स्कूलों में मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता पहले ही सवालों के घेरे में है। हाल ही में चाकघाट स्कूल में बच्चों को चावल के साथ “दाल का पानी” परोसे जाने का मामला वायरल हुआ था। ऐसे में हिनौती का विवाद साफ करता है कि बच्चों के पोषण की चिंता से ज्यादा नेताओं और अधिकारियों को “फंड और ठेका” की चिंता है।
फर्जी रसोइयों का खेल
जानकारी के अनुसार पीटीए काल में 8 रसोइयों का पंजीयन दिखाया गया, जबकि मौके पर 3–4 ही कार्यरत थे। शेष का मानदेय कथित रूप से पीटीए और प्राचार्य मिलकर हजम करते रहे। वर्तमान में भी वास्तविकता यही है कि पंजीकृत संख्या और कार्यरत रसोइयों में भारी अंतर है।
अब गेंद सीईओ के पाले में
ग्राम पंचायत सेदहा ने रागिनी और जय अंबे समूहों के साथ अनुबंध पूरा कर दिया है, लेकिन जिला स्तर पर फाइल अटकी हुई है। अब देखना यह है कि जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी नियमों का पालन कर नए समूहों को जिम्मेदारी सौंपते हैं या फिर राजनीतिक दबाव में पुराने समूहों का कब्जा कायम रहता है।
हिनौती स्कूल का यह मामला सिर्फ एक स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेश में मध्यान्ह भोजन योजना की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। जब बच्चों के निवाले तक में राजनीति और भ्रष्टाचार घुल जाए, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है – क्या मध्यान्ह भोजन का उद्देश्य वास्तव में बच्चों को पोषण देना है या नेताओं–अधिकारियों और ठेकेदारों की भूख मिटाना?











