रीवा संभाग के महाविद्यालयों की भूमि-भवन अभिलेख होंगे दुरुस्त, उच्च शिक्षा विभाग ने बनाई विशेष समिति
विंध्य वसुंधरा समाचार रीवा, मध्यप्रदेश 18 अगस्त।
रीवा संभाग के महाविद्यालयों की भूमि और भवन से संबंधित रिकॉर्ड में वर्षों से चली आ रही अव्यवस्था और विसंगतियों को दूर करने की दिशा में अब ठोस पहल शुरू हो गई है। क्षेत्रीय संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, रीवा ने आदेश जारी कर एक विशेष समिति का गठन किया है। यह समिति संभाग के सभी शासकीय महाविद्यालयों की भूमि और भवन का सत्यापन कर राजस्व अभिलेखों में विश्वविद्यालय/महाविद्यालय का नाम विधिवत दर्ज कराएगी।
रिकॉर्ड गड़बड़ी से जूझ रहे बड़े महाविद्यालय
सूत्रों के अनुसार, संभाग के कई प्रमुख एवं चर्चित महाविद्यालय अब तक राजस्व अभिलेखों में सही ढंग से दर्ज नहीं हैं। इनमें टीआरएस महाविद्यालय रीवा, शासकीय विज्ञान महाविद्यालय (साइंस कॉलेज) रीवा, शासकीय विधि महाविद्यालय रीवा एवं शासकीय संस्कृत महाविद्यालय रीवा जैसे संस्थान शामिल हैं। विडंबना यह है कि दशकों पुराने और हजारों विद्यार्थियों के अध्ययन का केंद्र रहे ये संस्थान अब तक कानूनी रूप से अपनी भूमि और भवन के पक्के अभिलेखों से वंचित हैं।
ग्रामीण महाविद्यालयों में और गंभीर स्थिति
ग्रामीण अंचलों में संचालित अनेक शासकीय महाविद्यालयों की भूमि का स्वामित्व रिकॉर्ड और भी अधिक उलझा हुआ है। कई जगहों पर राजस्व रिकॉर्ड के कॉलम नंबर 3 में अब भी निजी व्यक्तियों, ट्रस्टों या अन्य संस्थाओं के नाम दर्ज हैं, जबकि व्यवहार में वहां शासकीय महाविद्यालय संचालित हो रहे हैं। ऐसे मामलों में समिति को पहले राजस्व अभिलेखों से अवैध या अप्रासंगिक प्रविष्टियाँ विलोपित करानी होंगी, उसके बाद महाविद्यालय का नाम दर्ज कराया जाएगा।
प्राचार्यों से बैठक कर जुटाए जाएंगे दस्तावेज
गठित समिति प्रत्येक महाविद्यालय के प्राचार्य के साथ बैठक कर जमीन और भवन से संबंधित मूल दस्तावेज, स्वीकृत योजनाएँ और सरकारी आदेशों की प्रतियां जुटाएगी। इसके बाद राजस्व अधिकारियों के सहयोग से संपूर्ण अभिलेख दुरुस्त किए जाएंगे। समिति का यह भी दायित्व होगा कि जिन महाविद्यालयों के भवन निर्माण या विस्तार कार्य अटके हुए हैं, उनके लिए अभिलेखों का कानूनी निस्तारण शीघ्र कराया जाए।
वर्षों की लापरवाही का परिणाम
विशेषज्ञ मानते हैं कि महाविद्यालयों के भूमि-भवन संबंधी अभिलेखों में गड़बड़ी कोई नई बात नहीं है। लंबे समय से प्रशासनिक लापरवाही और राजस्व विभाग की उदासीनता के कारण ये संस्थान अधूरे रिकॉर्ड पर ही संचालित होते रहे। इसका खामियाजा कई बार महाविद्यालयों को भुगतना पड़ा है—भवन निर्माण में अड़चनें, भूमि विवाद, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा और अनुदान वितरण में विलंब जैसी समस्याएँ सामने आती रही हैं।
शिक्षा जगत में उम्मीद की किरण
समिति की कार्यवाही से अब उम्मीद बंधी है कि महाविद्यालयों की संपत्ति संबंधी कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। इससे उच्च शिक्षा संस्थानों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, नए भवन और प्रयोगशालाओं के निर्माण तथा विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराने में पारदर्शिता और तेजी आएगी।

