खसरे से गायब हो रही सरकारी और शैक्षणिक संस्थाओं की भूमि, राजस्व अभिलेखों में गड़बड़ी से उजागर हुई बड़ी लापरवाही
मध्यप्रदेश शासन की पारदर्शिता और डिजिटलीकरण के दावे अब खोखले साबित हो रहे हैं। सरकारी संस्थाओं की जमीनें ही आज सुरक्षित नहीं हैं। राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी, गलत प्रविष्टियाँ और अधूरे रिकॉर्ड प्रशासन की गंभीर लापरवाही को उजागर कर रहे हैं।
गढ़ क्षेत्र में संस्थागत भूमि पर संकट
रीवा जिले की मनगवा तहसील अंतर्गत गढ़ थाना क्षेत्र में सरकारी व शैक्षणिक संस्थाओं की भूमि अभिलेखों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियाँ उजागर हुई हैं—
पुलिस थाना गढ़ की भूमि – खसरे में “मध्यप्रदेश पुलिस थाना” दर्ज होना चाहिए था, लेकिन इसमें केवल “मध्यप्रदेश” लिखा गया है।
विद्यालयों की भूमि – स्कूलों की जमीन पर कहीं “धार्मिक स्थल” तो कहीं “कबीले कास्ट” जैसी प्रविष्टियाँ दर्ज हैं, जो पूर्णत: भ्रामक हैं।
प्रयोगशाला की भूमि – विद्यालय की प्रयोगशाला की जमीन 56 डेसिमल दर्ज थी, लेकिन खसरे में इसे “56 आर्य” कर दिया गया।
आयुर्वेद औषधालय की भूमि – यहाँ पर प्रयोगशाला और भवन की बजाय “मार्ग” दर्शा दिया गया है।
सड़कें अब भी गायब
इतना ही नहीं, राजस्व अभिलेखों में सड़कों का उल्लेख तक सही ढंग से नहीं किया गया।
गढ़ से लोरी मार्ग
गढ़ से नईगड़ी मार्ग
पुराना राष्ट्रीय राजमार्ग-27
आज तक इन मार्गों की पटरियाँ खसरे में अंकित नहीं की गईं। यह दर्शाता है कि बुनियादी ढांचे से जुड़ी ज़रूरी जमीनें भी रिकॉर्ड से बाहर रखी गई हैं।
खसरा मिलान और कंप्यूटरीकरण में लापरवाही
पटवारियों की जिम्मेदारी है कि वे समय-समय पर खसरे का मिलान कर त्रुटियों को दुरुस्त करें। लेकिन कंप्यूटरीकरण के नाम पर भी गड़बड़ी ही सामने आ रही है। बालक हायर सेकेंडरी स्कूल गढ़ थाना गढ़ की भूमि में कंप्यूटरीकृत खसरे में गंभीर उलझनें दर्ज हैं।
कब्जा और अनधिकृत निर्माण
सूत्र बताते हैं कि इन खामियों का फायदा उठाकर कई जगहों पर संस्थागत जमीनों पर कब्जा कर अन्य भवन और कार्यालय बना दिए गए हैं। भविष्य में इन संस्थाओं को अपनी ही जमीन ढूँढना मुश्किल होगा और विकास कार्य ठप हो जाएंगे।
प्रशासन पर सवाल
इस पूरे मामले में जिम्मेदारी सीधे तौर पर जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की बनती है।
जिला कलेक्टर, रीवा
पुलिस अधीक्षक
शिक्षा विभाग
राजस्व विभाग
जब वरिष्ठ अधिकारी ही रिकॉर्ड का संरक्षण सुनिश्चित नहीं कर पा रहे, तो डिजिटलीकरण और सुशासन के दावे बेअसर साबित हो रहे हैं।
जनता का आक्रोश
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि—
"जब थाने और स्कूल जैसी संस्थाओं की जमीन सुरक्षित नहीं है, तो आम जनता की जमीन कैसे बचेगी?"
"सड़कें और राष्ट्रीय राजमार्ग तक खसरे में दर्ज नहीं, तो डिजिटलीकरण का क्या फायदा?"





