लक्ष्मण बाग संस्थान भूमि रजिस्ट्री पर विवाद गहराया हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन, फिर भी प्रशासन पर रजिस्ट्री कराने का दबाव; आपत्ति दर्ज
लक्ष्मण बाग संस्थान, रीवा की भूमि को लेकर एक बार फिर विवाद ने तूल पकड़ लिया है। जिस भूमि पर स्वामित्व का मामला जनहित याचिका क्रमांक 1218/2025 के रूप में उच्च न्यायालय जबलपुर में विचाराधीन है, उसी भूमि की रजिस्ट्री कराए जाने की तैयारी शासन-प्रशासन के स्तर पर तेज होने की खबरें सामने आई हैं। इस कार्रवाई को लेकर न केवल कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं बल्कि स्थानीय नागरिकों में गहरी नाराज़गी भी है।
न्यायालय की अवमानना का आरोप
आज दिनांक 1 सितंबर को रजिस्ट्री कार्यालय, रीवा में उक्त भूमि से संबंधित रजिस्ट्री की प्रक्रिया प्रारंभ करने का प्रयास किया गया। इस पर अधिवक्ता बी.के. माला ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट कहा कि यह कदम सीधे-सीधे उच्च न्यायालय जबलपुर की अवमानना है। उन्होंने कहा कि जब तक प्रकरण न्यायालय में लंबित है, तब तक न तो भूमि की रजिस्ट्री हो सकती है और न ही किसी प्रकार का निर्माण अथवा बदलानामा किया जा सकता है।
पूर्व में भी हो चुका है पत्राचार
गौरतलब है कि इस विषय को लेकर पूर्व में भी संबंधित पक्षों ने आयुक्त रीवा एवं शासन-प्रशासन को लिखित आपत्तियाँ भेजी थीं। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर रजिस्ट्री प्रक्रिया आगे बढ़ाने का प्रयास यह दर्शाता है कि नियम-कानून को दरकिनार कर किसी दबाव में काम किया जा रहा है।
न्यायिक प्रक्रिया पर उठे सवाल
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि उच्च न्यायालय में मामला लंबित होने के बावजूद रजिस्ट्री की कार्रवाई की जाती है, तो यह न केवल न्यायिक व्यवस्था की खुली अवहेलना होगी, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगी। न्यायालय की स्पष्ट व्यवस्था है कि विचाराधीन मामलों में अंतिम निर्णय आने से पहले किसी भी प्रकार का हस्तांतरण या निर्माण नहीं किया जा सकता।
स्थानीय नागरिकों का आक्रोश
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने भी इस प्रकरण पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। उनका कहना है कि यदि न्यायालय में मामला विचाराधीन है, तो प्रशासन को तत्काल प्रभाव से रजिस्ट्री प्रक्रिया रोकनी चाहिए। नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि नियमों की अनदेखी कर रजिस्ट्री जबरन कराई गई, तो वे आंदोलन करने को बाध्य होंगे।
पृष्ठभूमि में विवाद
लक्ष्मण बाग संस्थान की भूमि को लेकर लंबे समय से स्वामित्व विवाद चला आ रहा है। संस्थान की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के कारण यह भूमि स्थानीय स्तर पर संवेदनशील मानी जाती है। पूर्व में भी कई बार इस विषय को लेकर प्रशासन को आपत्तियाँ दर्ज कराई गईं, किंतु अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। अब जब मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, तब प्रशासन द्वारा रजिस्ट्री कराने की कोशिशों ने विवाद को और गहरा कर दिया है।



