Breaking : 12 करोड़ के कराधान घोटाले में बड़ा मोड़ हाईकोर्ट को गुमराह करने वाले तत्कालीन SDOP मनगवां कृपाशंकर द्विवेदी पर उठे गंभीर सवाल, शासन से मांगा जवाब
रीवा, 6 सितंबर 2025 (स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट)।
मध्य प्रदेश का बहुचर्चित कराधान घोटाला एक बार फिर सुर्खियों में है। अब यह मामला केवल पंचायत स्तर पर हुए गबन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका और न्यायपालिका को गुमराह करने की गंभीर साजिश भी सामने आई है।
ताज़ा घटनाक्रम में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने शासन से पूछा है कि तत्कालीन एसडीओपी मनगवां कृपाशंकर द्विवेदी के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, जिन्होंने अदालत को गलत जानकारी देकर आरोपियों को राहत दिलवाई थी।
घोटाले की पृष्ठभूमि : पंचायतों में परफॉर्मेंस ग्रांट का दुरुपयोग
वर्ष 2018-19 में केंद्र सरकार द्वारा 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट के तहत लगभग 300 करोड़ रुपये मध्य प्रदेश की 1148 पंचायतों के सीधे खातों में भेजे गए।
योजना का उद्देश्य था – पंचायतों को वित्तीय स्वायत्तता और स्थानीय विकास कार्यों को गति देना।
लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट रही।
रीवा जिले की गंगेव जनपद की 38 पंचायतों में इस राशि का बंदरबांट हुआ।
पंचायतों ने फर्जी कराधान दिखाकर करोड़ों का घोटाला किया।
कलेक्टर और कमिश्नर की संयुक्त जांच में यह अनियमितता प्रमाणित हुई।
एफआईआर और नामजद आरोपी
जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ स्वप्निल वानखेडे ने मनगवां थाने में एफआईआर क्रमांक 470/2020 दर्ज करवाई। इसमें तीन मुख्य आरोपी बनाए गए
1. राजेश सोनी – लिपिक
2. प्रतिभा सिंह – रोजगार सहायक
3. नागेंद्र सिंह – शिव शक्ति मटेरियल सप्लायर
जांच पूरी होने के बाद चालान पेश हुआ और राजेश सोनी को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। वह लगभग 7 माह जेल में रहा, फिलहाल जमानत पर बाहर है। मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अदालत में लंबित है।
जब न्यायपालिका को गुमराह किया गया
मामले ने नाटकीय मोड़ तब लिया जब आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट जबलपुर में याचिकाएं दायर कीं।
पुलिस से रिपोर्ट तलब होने पर तत्कालीन एसडीओपी मनगवां कृपाशंकर द्विवेदी ने अदालत को गलत हलफनामा (एफिडेविट) प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि राजेश सोनी और अन्य आरोपियों के खिलाफ मनगवां थाने में कोई एफआईआर दर्ज नहीं है।
जबकि एफआईआर 470/2020 पहले से दर्ज थी और जांच में आरोपी नामजद भी किए जा चुके थे।
👉 इस गलत रिपोर्ट और भ्रामक हलफनामे के आधार पर अदालत ने आरोपियों को राहत दे दी।
सामाजिक कार्यकर्ताओं की लड़ाई से खुला सच
घोटाले को दबाने की कोशिश यहीं खत्म नहीं हुई।
सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी और अधिवक्ता संजय पांडेय ने लगातार आवाज उठाई।
उन्होंने शिकायत दर्ज करवाई कि तत्कालीन एसडीओपी कृपाशंकर द्विवेदी और अतिरिक्त सीईओ एबी खरे ने मिलीभगत कर आरोपियों को बचाने की साजिश रची।
उनके दबाव में शासन को मजबूरन रिव्यू पिटीशन क्रमांक 141/2023 हाईकोर्ट में दाखिल करनी पड़ी।
इसमें कमिश्नर और कलेक्टर की जांच रिपोर्ट का हवाला देकर आरोपियों पर दोबारा कार्रवाई की मांग की गई।
हाईकोर्ट का सख्त रुख
दिनांक 14 अगस्त 2025 को जस्टिस विशाल मिश्रा की बेंच ने सुनवाई के दौरान शासन से सीधा सवाल पूछा –
📝 “जब तत्कालीन एसडीओपी मनगवां कृपाशंकर द्विवेदी ने अदालत को गुमराह किया और गलत रिपोर्ट भेजी, तो उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई?”
अब तक शासन ने इस प्रश्न का कोई जवाब पेश नहीं किया है।
सेवानिवृत्ति कोई ढाल नहीं?
कृपाशंकर द्विवेदी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या रिटायरमेंट के बाद भी न्यायपालिका को गुमराह करने जैसे गंभीर अपराध पर कार्रवाई होगी?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत में गलत जानकारी देना केवल विभागीय दोष नहीं बल्कि आपराधिक कृत्य है, जिसके लिए दंड से बचा नहीं जा सकता।
जनता की निगाहें : जवाबदेही तय होगी या फिर बच निकलेंगे आरोपी?
यह पूरा मामला सिर्फ 12 करोड़ के गबन का नहीं है। यह उस प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर चोट है, जिस पर जनता अपना भरोसा करती है।
अगर यह घोटाला और अधिकारियों की मिलीभगत उजागर न होती तो यह भी भ्रष्टाचार की फाइलों में दब जाता।
अब जब हाईकोर्ट ने शासन से सवाल पूछ ही लिया है, तो जनता की निगाहें इस बात पर हैं कि –
👉 क्या शासन भ्रष्टाचारियों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करेगा,
या फिर यह भी एक और “अधूरी लड़ाई” बनकर रह जाएगी?
मामले की पूरी समयरेखा (Chronology of Events)
2018-19 : पंचायतों को परफॉर्मेंस ग्रांट के तहत 300 करोड़ जारी।
2020 : रीवा जिले की 38 पंचायतों में फर्जी कराधान और गबन उजागर। एफआईआर 470/2020 दर्ज।
2020-21 : चालान पेश, आरोपी राजेश सोनी गिरफ्तार। 7 माह जेल।
2021-22 : आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
तत्कालीन SDOP मनगवां कृपाशंकर द्विवेदी ने गलत एफिडेविट देकर कहा “कोई एफआईआर नहीं।”
2022 : आरोपियों को राहत।
2023 : सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल पर शासन ने रिव्यू पिटीशन क्रमांक 141/2023 दाखिल की।
14 अगस्त 2025 : हाईकोर्ट (जस्टिस विशाल मिश्रा) ने शासन से पूछा – “एसडीओपी पर क्या कार्रवाई हुई?”
6 सितंबर 2025 : अब तक शासन का जवाब लंबित।


