भ्रष्टाचार का सिर सत्ता में — अनुच्छेद 311 के अंतर्गत सख्त कार्रवाई ही एकमात्र समाधान
भारत का संविधान अपने नागरिकों को न केवल अधिकार देता है, बल्कि शासन-प्रशासन को भी एक दिशा और मर्यादा प्रदान करता है। अनुच्छेद 311 इसी मर्यादा का प्रतीक है — जिसके अंतर्गत सरकार को यह अधिकार है कि यदि कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी अपने पद का दुरुपयोग करता है, रिश्वतखोरी, अनियमितता या भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है, तो उसे सिर्फ नोटिस देकर सेवा से पृथक किया जा सकता है।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि यह अनुच्छेद केवल सरकारी फाइलों में कैद होकर रह गया है, जबकि धरातल पर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि शासन-व्यवस्था की नींव तक को हिला रही हैं।
विद्वानों का यह कथन आज के परिप्रेक्ष्य में बिल्कुल सटीक बैठता है — “मछली हमेशा सिर से सड़ती है।” इसका सीधा अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार नीचे से नहीं, बल्कि ऊपर से शुरू होता है और फिर धीरे-धीरे नीचे तक फैलता है। यही स्थिति आज रीवा जिले में भी दिखाई देती है। यहां भ्रष्टाचार का सिर सत्ता में बैठा हुआ है — सत्ता से जुड़े सट्टेबाज, दलाल और कुछ जनप्रतिनिधि ही इस मछली के सिर का प्रतीक बन गए हैं।
भ्रष्टाचार का यह जाल हर विभाग में फैला है — परिवहन विभाग, आबकारी विभाग, पुलिस विभाग, राजस्व विभाग, सहकारिता विभाग, खनिज विभाग समाज का चौथा स्तंभ के कुछ तथाकथित — कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं। इन विभागों के कई अधिकारी और कर्मचारी अपने कर्तव्यों से भटककर केवल “मंथली सेवा शुल्क” यानी मासिक रिश्वत पर केंद्रित हो चुके हैं। न तो जनता की सुनवाई हो रही है, न ही पारदर्शिता बची है।
रीवा जिले का स्वस्थ विभाग को पहले भगवान और भक्त के संबंध थे। किंतु अब यह हालात हो चुके है कि यह भी स्वार्थ की भेट चढ़ गया। चिकित्सकों को भगवान का दर्जा प्राप्त होता है लेकिन अब यह भी कहावत भी बन चुकी है
अवैध खनन, अवैध शराब का कारोबार, ओवरलोड वाहन संचालन, फर्जी भूमि बंटवारे, झूठे बिल और घोटाले — सब कुछ खुलेआम चल रहा है। आम जनता की आवाज़ दबाई जाती है, शिकायत करने वालों को धमकाया जाता है, और जिम्मेदार अधिकारी या तो मौन रहते हैं या मिलीभगत कर लेते हैं।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि देश की आर्थिक व्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है। देश कर्ज में डूबता जा रहा है, जबकि भ्रष्ट व्यक्ति दिन-ब-दिन लखपति, करोड़पति और अरबपति बनते जा रहे हैं। इस असमान समृद्धि का यह दौर लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार है।
अगर इतिहास की ओर नज़र डालें तो 1985 के दशक में रीवा जैसे जिलों में स्थिति बिल्कुल अलग थी — उस समय एक आम आदमी को जूते, पजामा या शर्ट-जर्सी खरीदने के लिए महीनों मेहनत करनी पड़ती थी। लेकिन आज वही समाज इस स्थिति में आ गया है कि हर घर में दो-तीन जोड़ी जूते, कई सेट कपड़े, और महंगे मोबाइल व गाड़ियां हैं — चाहे वह गरीब हो, मध्यम वर्ग का हो या अमीर। सवाल यह है कि यह संपन्नता मेहनत से आई है या भ्रष्टाचार की कृपा से?
रीवा जिला आज एक दर्पण बन चुका है — जो दिखा रहा है कि कैसे सत्ता की चुप्पी और तंत्र की कमजोरी ने भ्रष्टाचार को एक वैध संस्कृति में बदल दिया है। अब वक्त आ गया है कि अनुच्छेद 311 को सिर्फ संविधान की किताबों से निकालकर वास्तविक कार्रवाई के स्तर पर लागू किया जाए। ऐसे सभी भ्रष्ट अधिकारियों, कर्मचारियों और पदाधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया जाए, जिन्होंने जनता के विश्वास और देश की मर्यादा को तोड़ा है।
जब तक शासन-प्रशासन के सिर से यह मछली साफ नहीं होगी, तब तक नीचे तक स्वच्छता की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती।
समय है कि सख्त कदम उठाकर व्यवस्था को फिर से ईमानदारी के रास्ते पर लाया जाए — ताकि देश और प्रदेश के साथ रीवा जिला भी भ्रष्टाचार की गिरफ्त से मुक्त हो सके।


