📰 सपनों का घर या नियमों का मखौल? कॉलोनियों के नाम पर चल रहा ‘भू-माफियाओं’ का स्वप्न व्यापार
रीवा। विकास के नाम पर अव्यवस्था और अनियमितताओं का जाल अब शहर के हर कोने में फैल चुका है। जहां आम नागरिक अपनी जिंदगी की कमाई लगाकर एक सुरक्षित “सपनों का घर” बनाने का सपना देखता है, वहीं कुछ प्रभावशाली भू-व्यवसायी उस सपने को “नियमों की तिजोरी” में बंद कर रहे हैं।
रीवा शहर की चर्चित श्रीजी कंपनी द्वारा विकसित की जा रही आवासीय कॉलोनी अब गंभीर सवालों के घेरे में है। कंपनी द्वारा आवासीय कॉलोनी बनाकर भूखंडों और डुप्लेक्स मकानों का विक्रय किया जा रहा है। किंतु बताया गया है कि इस प्रक्रिया में कंपनी ने शासन और नगर निगम के नियामकीय प्रावधानों का खुलेआम उल्लंघन किया है।
नियमों को दरकिनार कर जारी है कॉलोनी का निर्माण
जानकारी के अनुसार, कंपनी ने भू-संपदा विनियमन एवं विकास अधिनियम की विपरीत दिशा में जाकर कॉलोनी के नक्शा और मानचित्र सुकृति में अनाधिकृत संशोधन किए हैं। न केवल मानचित्र बदले गए, बल्कि जिन सुविधाओं को पूर्व स्वीकृत नक्शे में दर्शाया गया था, उनमें मनमाने बदलाव कर दिए गए।
सबसे गंभीर तथ्य यह है कि योजना के अनुमोदन हेतु जिस समिति का गठन आवश्यक था, वह आज तक नहीं किया गया है। इसके बावजूद कॉलोनी में डुप्लेक्स भवनों का निर्माण तेज़ी से जारी है। यह निर्माण पूर्णतः नियम विरुद्ध है और नगर निगम की अनदेखी पर गहरे प्रश्नचिह्न लगाता है।
सुविधाओं के नाम पर छलावा और धोखाधड़ी
कॉलोनी वासियों ने बताया कि कंपनी ने उन्हें “सुविधा संपन्न और आधुनिक आवास” का सपना दिखाया था, लेकिन हकीकत में यह सपना केवल कागज़ी नक्शे तक सीमित रह गया। न सड़कें पूर्ण हैं, न जल निकासी की व्यवस्था, और न ही सार्वजनिक सुविधाओं का प्रावधान। हर ईंट मानो कानून और जनविश्वास के ताबूत पर रखी जा रही हो।
सपनों का घर दिखाकर कंपनी ने कॉलोनी वासियों और अन्य खरीदारों के साथ आर्थिक व कानूनी धोखाधड़ी की है। लोगों ने इसे अपने साथ किया गया “नियामकीय छल” बताया है।
अधिवक्ता बी.के. माला का संवैधानिक प्र
तिकार
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता बी.के. माला ने इस पूरे मामले में संवैधानिक स्तर पर सतत प्रतिकार करते हुए मध्यप्रदेश रेरा कार्यालय, भोपाल में लिखित शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत की गंभीरता को देखते हुए रेरा कार्यालय ने नगर निगम आयुक्त, रीवा को जांच के स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। साथ ही, इसकी प्रतियां अन्य विभागीय कार्यालयों को भी प्रेषित की गई हैं ताकि पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
विकास या विनाश की नींव?
रीवा में अब “विकास” का अर्थ ही बदलता प्रतीत हो रहा है। यहां नक्शे में संशोधन का मतलब “नियमों को अवसर में बदलना” और कॉलोनी निर्माण का अर्थ “जनविश्वास का विध्वंस” बन गया है। नगर निगम की नीतियां आज निरीह दिख रही हैं, जबकि ठेकेदारों और बिल्डरों की चालाकी निरीक्षणों से अधिक प्रभावशाली हो गई है।
आमजन के सपनों के ये घर अब न्याय की प्रतीक्षा में हैं — जैसे कोई अधूरा दरवाज़ा जो न पूरी तरह खुलता है, न बंद होता है। सवाल यही है कि क्या रेरा और नगर निगम की संयुक्त कार्यवाही इस “स्वप्न व्यापार” को रोक पाएगी या यह भी किसी फ़ाइल के मकबरे में दफ़्न होकर रह जाएगा?




