📰 रीवा-मऊगंज में नशे का साम्राज्य: जिम्मेदार विभागों की मिलीभगत या मौन स्वीकृति?
युवाओं का भविष्य दांव पर, पुलिस की ‘थपथपाई’ और सिस्टम की खामोशी से फल-फूल रहा मादक व्यापार
विंध्य क्षेत्र का गौरवशाली इतिहास अब नशे के साये में सिमटता जा रहा है। रीवा और मऊगंज जिले में नशे का ऐसा जाल बिछ चुका है, जिसने न केवल युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
आए दिन सोशल मीडिया पर नशा माफियाओं के वीडियो वायरल होते हैं, पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जाती है। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर से ही इस अवैध कारोबार को संरक्षण प्राप्त है।
🔍 हर थाना क्षेत्र में सक्रिय नशे का नेटवर्क
रीवा-मऊगंज जिले का शायद ही कोई थाना क्षेत्र बचा हो, जहां मेडिकल नशे का कारोबार न पनप रहा हो। गढ़ थाना क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां दर्जनों लोग नशीली गोलियों और सिरप की अवैध सप्लाई करते हैं।
सूत्रों के अनुसार, थाने से कुछ ही दूरी पर यह धंधा खुलेआम चलता है, और पुलिस की मौजूदगी के बावजूद किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि इसे रोक सके।
करीब 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में इन माफियाओं की पहुंच है — जिनका नेटवर्क न केवल शहर बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
⚠️ मेडिकल नशे का भयावह प्रसार
इन नशीली दवाओं की बिक्री सामान्य मेडिकल दुकानों, प्राइवेट क्लीनिकों और यहां तक कि कुछ हॉस्पिटलों के आसपास भी होती है। प्रतिबंधित कोडीन युक्त सिरप, ट्रामाडोल, अल्प्राजोलम, नाइट्राविन जैसी दवाएं अब “नींद की दवा” या “सर्दी-जुकाम का सिरप” बनकर खुलेआम बिक रही हैं।
बीते तीन महीनों में नशे के मामलों में 25% तक वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन प्रशासनिक आंकड़ों में इनका कहीं कोई जिक्र नहीं।
🧍♂️ युवा पीढ़ी पर गहराता खतरा
रीवा और मऊगंज के युवाओं में नशे की लत ने भयावह रूप ले लिया है। स्कूल और कॉलेज के छात्र भी इस चपेट में आ रहे हैं। एक बार इस दलदल में फंसने के बाद उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है — न पढ़ाई बचती है, न रोजगार।
कई परिवार अपने बच्चों को सुधार गृहों और निजी नशा मुक्ति केंद्रों तक ले जाने को मजबूर हैं, जबकि असली कारण — नशे की खुली बिक्री — पर किसी तरह की रोक नहीं लग रही।
🏛️ जिम्मेदारों की भूमिका पर सवाल
अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि —
क्या ड्रग इंस्पेक्टर अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं?
क्या थाना प्रभारी, ग्राम पंचायत सचिव और पटवारी अपने क्षेत्र की स्थिति से अनजान हैं?
क्या यह जानकारी संबंधित उच्च अधिकारियों तक नहीं पहुंचती, या फिर इसे दबा दिया जाता है?
यदि जिला प्रशासन इन जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय कर दे, तो 24 घंटे के भीतर पूरा जिला नशामुक्त किया जा सकता है। लेकिन वर्तमान में ऐसा प्रतीत होता है कि कार्रवाई करने की बजाय “सिस्टम” अपनी पीठ खुद थपथपा रहा है।
💰 कुबेरों की तिजोरियाँ भर रही हैं, समाज खोखला हो रहा है
नशा माफिया दिन-दूनी रात-चौगुनी कमाई कर रहे हैं। ड्रग माफिया, मेडिकल स्टोर मालिक, और कुछ भ्रष्ट तंत्र के लोग इस अवैध व्यापार से कुबेर बन बैठे हैं।
यदि यही स्थिति जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब समाज की नैतिक और आर्थिक नींव पूरी तरह ढह जाएगी।
📣 जनता की पुकार
अब जनता चाहती है औपचारिक जांच नहीं, निर्णायक कार्रवाई। जब तक जिला प्रशासन और पुलिस पूरी निष्ठा से इस अभियान में नहीं उतरेंगे, तब तक रीवा-मऊगंज के युवाओं की जिंदगी अंधकार से बाहर नहीं आ सकेगी।





