दीपावली पर “जांच” के नाम पर वसूली का खेल — मिलावट ने तोड़ी सीमाएं, मानवता पर पड़ा ग्रहण
माघ मेले की तरह दीपावली पर भी औपचारिक जांचें बनीं निजी स्वार्थ की भेंट, प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल
त्योहार खुशियों का प्रतीक होता है, लेकिन जब इन्हीं खुशियों के बीच स्वार्थ, भ्रष्टाचार और मिलावट का ज़हर घुल जाए, तो समाज की आत्मा तक कराह उठती है।
दीपावली जैसे पावन पर्व पर भी रीवा जिले में जांच और स्वच्छता के नाम पर वसूली का घिनौना खेल खुलेआम खेला जा रहा है।
हाल ही में माघ मेले के दौरान जिला प्रशासन द्वारा ढाबों और होटलों की जांच कराई गई थी। उस समय जिला कलेक्टर के आदेश पर कई टीमें बनाई गई थीं, लेकिन परिणाम क्या हुआ?
जांच का उद्देश्य जनता की सुरक्षा था, परंतु वह जांच “निजी स्वार्थ की पूर्ति की बाली” चढ़ गई। अब दीपावली के समय भी वही तस्वीर दोहराई जा रही है — नाम “जांच” का, काम “वसूली” का।
⚠️ मिलावट का बोलबाला — शहर से गांव तक फैला ज़हर
दीपावली के अवसर पर जहां एक ओर लोग मिठाई, तेल, घी, और स्नैक्स की खरीद में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर बाजार में मिलावट का साम्राज्य फैल चुका है।
रीवा शहर से लेकर मऊगंज, हनुमना, नईगढ़ी, गढ़, मनगवा, और ग्रामीण अंचलों तक सड़क किनारे ढाबों, हलवाईयों और होटलों में घी, दूध, खोवा, तेल और मसालों में मिलावट का कारोबार चरम पर है।
यहां तक कि दीपावली में उपयोग होने वाले दीये, तेल, अगरबत्ती, रंगीन पटाखे, सजावटी सामान और मिठाईयों तक में मिलावट की बू फैल चुकी है।
🧾 कलेक्टर के आदेश बनते हैं औपचारिकता
जिला कलेक्टर द्वारा समय-समय पर सख्त निर्देश जारी किए जाते हैं कि त्योहारी सीजन में खाद्य पदार्थों की जांच की जाए, पर सवाल यह है —
क्या जांच वाकई होती है या केवल दिखावे की?
सूत्रों के अनुसार, जांच टीमें मैदान में तो उतरती हैं, लेकिन उनका ध्यान जनता की सुरक्षा पर नहीं बल्कि निजी लाभ पर केंद्रित रहता है। जांच के नाम पर दुकानदारों और व्यापारियों से “सेटलमेंट” की मांग की जाती है, जिससे पूरी प्रक्रिया जनता के साथ मज़ाक बनकर रह जाती है।
🧪 खाद्य पदार्थ ही नहीं, जीवन में भी मिलावट
आज स्थिति यह है कि केवल खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि मानवता तक में मिलावट घुल चुकी है।
जो अधिकारी जनता की सुरक्षा के लिए नियुक्त हैं, वे अब स्वयं जनजीवन के लिए खतरा बन गए हैं।
पैसे की लालसा में लोग भूल चुके हैं कि यह धन जीवन का साधन है, उद्देश्य नहीं।
धन के पीछे भागते-भागते वे यह नहीं समझ पा रहे कि धन से जीवन नहीं खरीदा जा सकता।
इतिहास गवाह है — महलों, किलों और कोठियों में भरे रहे हीरे-जवाहरात आज खंडहर बन चुके हैं, परंतु मानवता के कार्य आज भी याद किए जाते हैं।
🏛️ अब जरूरी है — जांच की भी जांच
अब यह समय आ गया है कि केवल खाद्य पदार्थों की ही नहीं, बल्कि जांच करने वाले अधिकारियों की भी जांच की जाए।
जनता का यह हक है कि उसे बताया जाए —
कितने सैंपल लिए गए?
कितने में मिलावट पाई गई?
कितनों पर कार्रवाई हुई?
और सबसे बड़ा सवाल — किस अधिकारी ने कितनी वसूली की?


