📰 गढ़ बाजार की सड़क बनी भ्रष्टाचार की शिकार — सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने कहा, “सड़क नहीं, भ्रष्टाचार बनता है बार-बार”
रीवा जिले की मनगवां तहसील के अंतर्गत आने वाले गढ़ बाजार क्षेत्र की सड़क, जो पुराने राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 27 से जुड़ी है, आज बदहाल स्थिति में पहुंच चुकी है। कभी इस सड़क पर वाहन सुगमता से गुजरते थे, वहीं अब हालात ऐसे हैं कि पैदल चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं। गड्ढों, धूल और कीचड़ से भरी इस सड़क की हालत देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि विकास के नाम पर यहां केवल आश्वासन और दिखावे की राजनीति चल रही है।
इसी विषय पर क्षेत्र के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने स्थानीय विधायक और विभागीय अधिकारियों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “गढ़ की यह सड़क वर्षों से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती आ रही है। यह सड़क कई बार बनी, लेकिन हर बार उसी गति से टूट भी गई। कारण एक ही है — पैसा आता है, पर गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता। निर्माण कार्य में लगी एजेंसियां, ठेकेदार, और कुछ अधिकारी आपस में मिलीभगत करके सरकारी राशि को हजम कर लेते हैं।”
🔍 “कागजों पर सड़क बनती है, धरातल पर गड्ढे दिखते हैं”
शिवानंद द्विवेदी ने कहा कि सड़क निर्माण के नाम पर ऊपरी परत पर सिर्फ ऑयल मिक्स्ड बिटुमेन डाल दिया जाता है। दिखने में सड़क नई लगती है, पर दो-तीन महीने में ही उखड़ने लगती है। “यह सड़क गांव की भाषा में ‘चुपरा-चुपरी’ सड़क बन जाती है — यानी ऊपर से चिकनी, अंदर से खोखली,” उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा।
गढ़ बाजार की यह सड़क लगभग ढाई से तीन किलोमीटर लंबी है और प्रतिदिन सैकड़ों लोग इसका उपयोग करते हैं। दुकानदार, स्कूली बच्चे, किसान और आम नागरिक सभी इसी मार्ग से गुजरते हैं। लेकिन सड़क पर गड्ढों और कीचड़ के कारण दुर्घटनाएं आम हो गई हैं।
🧱 “अब पीसीसी सड़क ही बने, तभी टिकेगी”
द्विवेदी का कहना है कि गढ़ बाजार का यह हिस्सा मार्केट एरिया होने के कारण यहां पर हमेशा भीड़ रहती है और पानी की निकासी का उचित प्रबंध नहीं है। “सड़क के दोनों तरफ नालियां नहीं हैं, जिससे बारिश का पानी सीधे सड़क पर बहता है और बिटुमिन सड़क जल्दी खराब हो जाती है। इस स्थिति में अब इस सड़क को केवल पीसीसी (कंक्रीट) स्वरूप में ही बनाया जाना चाहिए,” उन्होंने कहा।
उन्होंने आगे बताया कि “कांक्रीट की सड़क की खासियत यह है कि यह पानी के प्रभाव से खराब नहीं होती। एक बार यदि ठीक से गुणवत्ता के साथ बनाई जाए, तो यह वर्षों तक टिकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि निर्माण में सही रेशियो — सीमेंट, गिट्टी और रेत का संतुलन रखा जाए।”
⚠️ “विधायक केवल पत्र जारी कर रहे हैं, धरातल पर कुछ नहीं”
शिवानंद द्विवेदी ने स्थानीय विधायक पर निशाना साधते हुए कहा कि “हर बार केवल पत्र जारी कर देने से काम पूरा नहीं होता। जनता को पत्र नहीं, परिणाम चाहिए। विधायक का कर्तव्य है कि वह केवल निर्देश देकर न रुकें, बल्कि यह सुनिश्चित करें कि काम वास्तव में हो भी रहा है या नहीं।”
उन्होंने कहा कि “विकास का असली मतलब यह नहीं कि मीडिया में बयान दे दिया जाए या फोटो खिंचवा ली जाए। विकास का अर्थ है — जनता को राहत मिले, सड़कें मजबूत हों, और भ्रष्टाचार पर लगाम लगे।”
🧾 उन्होंने प्रशासन और शासन से रखी ये प्रमुख मांगें:
1. गढ़ बाजार की सड़क को तत्काल पीसीसी कांक्रीट से निर्मित किया जाए।
2. सड़क के दोनों ओर पक्की नालियों का निर्माण कराया जाए ताकि बरसात के पानी से सड़क खराब न हो।
3. सड़क निर्माण के लिए दी जाने वाली राशि की स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच की जाए।
4. निर्माण कार्य की रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम स्थापित किया जाए।
5. जिन अधिकारियों और ठेकेदारों पर गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप हैं, उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
🗣️ “भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ तो सड़क फिर टूटेगी”
शिवानंद द्विवेदी ने कहा कि “भारत में सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार की है। जब तक इस पर अंकुश नहीं लगाया जाएगा, तब तक कोई भी सड़क — चाहे बिटुमिन की बने या कांक्रीट की — लंबे समय तक नहीं टिकेगी। यदि निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग और पारदर्शिता नहीं रखी गई, तो विकास की सड़कें हमेशा कागजों पर ही चमकेंगी।”
🚩 जनता की आवाज़ — “अबकी बार दिखे धरातल पर विकास”
गढ़ बाजार के लोगों का कहना है कि हर चुनाव के समय सड़क सुधार के वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही सब भूल जाते हैं। दुकानदारों ने बताया कि सड़क की खराब हालत से व्यवसाय पर असर पड़ रहा है, जबकि स्कूली बच्चों के अभिभावक रोज़ाना हादसों के डर में जीते हैं।
जनता की एक ही मांग है —
“अबकी बार सड़क ऐसी बने जो बरसात में भी टिके, सालों तक चले और हमें विकास का असली मतलब समझाए।”
गढ़ बाजार की यह सड़क अब सिर्फ एक निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि जनता के धैर्य और व्यवस्था की परीक्षा बन चुकी है। यदि इस बार भी आधे-अधूरे प्रयास हुए, तो यह मुद्दा आने वाले चुनावों में राजनीतिक प्रश्न बन सकता है। जनता अब इंतजार नहीं करना चाहती — उसे चाहिए पारदर्शिता, गुणवत्ता और स्थायी समाधान।




