📰 धान की फसल पर बेमौसम बरसात की दोहरी मार — मेहनत, उम्मीद और निवेश सब डूबा, किसान बोले “अब आसमान भी हम पर मेहरबान नहीं”
रीवा। किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। खरीफ 2025 की धान की फसल इस बार बहुत उम्मीदों के साथ बोई गई थी। जुलाई से सितंबर तक मौसम साथ देता दिखा, पौधें हरे-भरे खड़े रहे और खेतों में लहराती फसल ने अन्नदाताओं के चेहरे पर मुस्कान ला दी थी। लेकिन अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में हुई तेज और लगातार बारिश ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। अब खेतों में फसल नहीं, किसानों की लाचारी तैर रही है।
🌾 खरीफ की मेहनत पर बारिश की मार — खेतों में डूब गई उम्मीदें
रीवा जिले के गंगेव, मनगवां, रायपुर कर्चुलियान, हनुमना, त्योंथर और नईगढ़ी जैसे इलाकों में किसानों ने बताया कि तेज़ बारिश से खेतों में पानी भर गया है। धान की फसल कटाई के लिए तैयार थी, लेकिन अचानक हुई बारिश ने फसल को गिरा दिया, पौधें सड़ने लगे हैं और कई जगह कटे हुए धान के ढेर मंडियों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो गए।
गांवों में अब सिर्फ एक ही चर्चा है — “हमारा क्या होगा?”
“हमने पूरी उम्मीद के साथ रोपाई की थी। पहले खाद नहीं मिला, फिर बारिश ने सब बरबाद कर दिया। खेतों में खड़ा धान अब सड़ रहा है। मेहनत गई, पैसे गए, और सरकार सिर्फ सर्वे की बात कर रही है।” — किसान रामसजीवन साकेत, ग्राम हिनौती
💰 कृषि विभाग के आंकड़े और ज़मीनी सच्चाई में बड़ा अंतर
कृषि विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, एक एकड़ धान की लागत ₹10,000 मानी जाती है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और है। किसानों का कहना है कि एक एकड़ खेत की असल लागत ₹18,000 से ₹22,000 तक पहुंच जाती है।
रोपाई का खर्च: ₹5,000 से ₹7,000 प्रति एकड़
बीज की कीमत: ₹40 से ₹50 प्रति किलो
खाद व कीटनाशक: ₹3,000 से ₹4,000 प्रति एकड़
मजदूरी, सिंचाई व देखरेख: ₹5,000 से अधिक
धान की बुवाई से लेकर कटाई तक किसान लगातार मेहनत, समय और धन झोंकता है। लेकिन जब फसल तैयार होती है, तब ऐसी बरसात उसका सब कुछ बहा ले जाती है।
☔ बेमौसम बरसात ने तोड़ी किसानों की कमर — घरों में चूल्हे ठंडे
रीवा जिले के अधिकांश गांवों में किसानों की हालत दयनीय है। जिन खेतों में पहले लहलहाती फसलें खड़ी थीं, वहाँ अब सिर्फ गीली मिट्टी और सड़े धान की गंध है।
कई किसानों के घरों में अब तक नई फसल आने की खुशी में तैयारियाँ होनी चाहिए थीं, लेकिन अब वहाँ सन्नाटा है। कुछ घरों में तो चूल्हा तक नहीं जल पाया।
“धान बिकता तो घर चल जाता, लेकिन अब नुकसान इतना हुआ कि अगले सीजन के लिए भी कुछ नहीं बचा।” — किसान राजेश पटेल, मनगवां
📜 बीमा योजना सिर्फ नाम की, राहत कागज़ों तक सीमित
सरकार द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तो लागू है, लेकिन इसमें कई खामियां हैं। खरीफ सीजन में केवल “धान” को अधिसूचित फसल के रूप में शामिल किया गया है। तिल, ज्वार या अन्य फसलें बीमा के दायरे में नहीं हैं।
कई किसानों ने बताया कि बीमा के लिए नामांकन तो बैंक या सहकारी समिति के माध्यम से हो जाता है, लेकिन क्लेम की राशि या तो बहुत देर से आती है, या फिर फॉर्म में गड़बड़ी होने के कारण कई किसान उससे वंचित रह जाते हैं।
“हमने हर साल बीमा कराया, लेकिन जब नुकसान हुआ तो कोई नहीं पूछता। सर्वे की बात होती है, पर मुआवज़ा कब मिलेगा, कोई नहीं जानता।” — किसान शिवनारायण कोल, रायपुर कर्चुलियान
🏛️ प्रशासन की चुनौती — राहत पहुंचाने में न हो देरी
जिले के कई इलाकों से खेतों में पानी भरे होने की रिपोर्टें आ चुकी हैं। ब्लॉक स्तर पर सर्वे टीमों का गठन किया जा रहा है, लेकिन किसानों को डर है कि सर्वे रिपोर्ट आने तक फसलें पूरी तरह सड़ जाएंगी।
कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि बीमा कंपनियों और तहसील स्तर पर संयुक्त सर्वे कराया जाएगा। लेकिन पिछली बार की तरह अगर यह प्रक्रिया महीनों चली, तो किसानों को राहत के बजाय निराशा ही मिलेगी।
🌱 किसानों की उम्मीद — सरकार दे तुरंत राहत, वरना अगला सीजन अधर में
रीवा और आसपास के सभी गांवों में किसान अब सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। उनका कहना है कि अगर इस बार भी उन्हें उचित मुआवज़ा नहीं मिला, तो अगली रबी की फसल बोना असंभव हो जाएगा।
“धान हमारा जीवन था। अगर यही नहीं बचा तो खेतों में बीज कौन डालेगा?” — एक किसान की टूटती उम्मीद
रीवा जिले की यह स्थिति केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के किसानों की कहानी है। मेहनत, निवेश और उम्मीद — तीनों बेमौसम बरसात की भेंट चढ़ गए। अब सवाल यह है कि क्या सरकार किसानों को सिर्फ “अन्नदाता” कहकर छोड़ देगी, या वास्तव में उन्हें राहत देने के लिए आगे आएगी।
क्योंकि अगर किसान हारा — तो खेत नहीं, पूरा देश हारेगा। 🌾🇮🇳



