📰 भ्रष्टाचार की जड़ें — जब व्यवस्था ही बन जाए बाजार
वरिष्ठ अधिकारी और राजनेता जब संरक्षक बनें, तो ईमानदारी की कब्र खुद बिछ जाती है
जब भ्रष्टाचार के बीज अंकुरित होते हैं, तो यदि समय रहते उन पर नियंत्रण कर दिया जाए, तो समाज की जड़ें सड़ने से बच सकती हैं। किंतु आज हालात ऐसे हैं कि यह बीज अब वृक्ष बन चुके हैं — जिनकी छाया में पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है। शासन-प्रशासन का हर स्तर, अस्पताल से लेकर थाना तक, और परिवहन से लेकर खाद्य विभाग तक, कहीं न कहीं ‘सेवा शुल्क’ के नाम पर रिश्वत की गंध से भरा हुआ है।
⚖️ जब नीति नहीं, “सिफारिश” तय करे पदस्थापनाएं
प्रदेश के मुखिया बार-बार यह कहते हैं कि “अधिकारियों की पदस्थापना माननीयों की अनुशंसा से होगी” — लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जड़ नहीं बन चुकी?
थानों से लेकर जिलों तक “मंथली सिस्टम” खुलेआम चल रहा है। सिपाही से लेकर थाना प्रभारी तक, हर स्तर पर दरें तय हैं। एक अस्पताल में मरीज की नस में सूई लगाने से लेकर डॉक्टर की पर्ची तक, हर सेवा का अलग रेट तय है। जब पदस्थापनाएं “राजनीतिक सिफारिश” से होती हैं, तो ईमानदारी की उम्मीद करना व्यर्थ है।
🚨 थानों की मंथली, काले धंधों की मंजूरी
रीवा और मऊगंज सहित संभाग के कई थानों में यह चर्चा आम है कि “मंथली” के बिना कोई पद नहीं टिकता। और जब देना पड़ता है, तो लेना भी तय है — यही से शुरू होता है काले कारोबार का जाल।
दारू, बालू, नशीली कफ सिरप, टैबलेट और अवैध व्यापार — सबका हिस्सा “ऊपर” तक जाता है। मेडिकल दुकानों से लेकर खाद्यान्न दुकानों तक मिलावट का जाल फैला है, पर कोई रोक नहीं। हर पदस्थापना से पहले “ऊपर की कृपा” और “नीचे की पूजा” दोनों जरूरी हैं।
🏥 स्वास्थ्य सेवाओं में रिश्वत का इंजेक्शन
अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा अब सेवा नहीं, सौदा बन चुकी है। मरीज की नस तक पहुंचने के लिए भी फीस तय है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी और निजी अस्पतालों में लूट — दोनों मिलकर जनता को मजबूरी का कैदी बना चुके हैं। डॉक्टर, कर्मचारी और बिचौलिए मिलकर एक अदृश्य चेन बना चुके हैं, जहां हर कदम पर “सेवा शुल्क” देना आम बात हो गई है।
🚛 परिवहन विभाग — सड़क पर लूट का साम्राज्य
परिवहन विभाग की लूट अब किसी से छिपी नहीं। बिना स्वीकृति के चल रहे स्कूल वाहनों की संख्या हजारों में है। रीवा और मऊगंज जिलों में लगभग 7 से 8 हजार तीन और चार पहिया वाहन बिना अनुमति बच्चों की जान जोखिम में डाल रहे हैं। न तो स्कूलों की बसें मानक पर हैं, न चालकों के पास वैध प्रशिक्षण।
दुर्घटनाओं के बाद कुछ दिन हल्ला मचता है, अधिकारी बयान देते हैं, लेकिन फिर सबकुछ पहले जैसा। ऊपर से नीचे तक सांठगांठ इतनी गहरी है कि कार्रवाई “ट्रैफिक सिग्नल” की तरह होती है — लाल भी जलता है, लेकिन रुकता कोई नहीं।
🍾 दारू, नशा और अवैध कारोबार — कानून के सामने मजाक
शराब दुकानों के लिए स्पष्ट नियम है कि उनके आसपास कोई ऐसा स्थल न हो, जहां लोग बैठकर शराब पी सकें, पर पूरे रीवा संभाग में इसका पालन कहीं नहीं होता।
सड़क किनारे, ढाबों और होटलों के सामने खुलेआम लोग बैठकर पीते हैं। कभी-कभार छापे पड़ते हैं, कुछ बोतलें जब्त होती हैं, फोटो खिंचती है, लेकिन अगले ही दिन सब कुछ फिर वैसा ही।
दारू, गांजा, नशीली कफ सिरप और गोलियों का कारोबार अब “अघोषित वैधता” पा चुका है — बस ऊपर की कृपा बनी रहे तो नीचे सब चलता है।
🌾 किसान की जेब में डाका — खाद की खुली लूट
किसानों के नाम पर योजनाएं बनती हैं, पर लाभ बिचौलियों के जेब में चला जाता है।
जुलाई से सितंबर तक खाद वितरण की हड़ताल के बाद समझौता हुआ, किंतु मूल्य नियंत्रण नहीं हो सका। शासन द्वारा निर्धारित मूल्य 1350 रुपए प्रति बोरी (डीएपी) और 266 रुपए (यूरिया) के बावजूद बाजार में डीएपी ₹1800 और यूरिया ₹600 में बिक रही है।
अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को यह सब दिखाई नहीं देता। शायद यह नया नियम बन गया है — “लूटो, जब तक जनता चुप है।”
⚙️ व्यवस्था नहीं, ‘व्यवसाय’ बन चुका सिस्टम
हर विभाग, हर कार्यालय अब सेवा केंद्र नहीं, बल्कि वसूली केंद्र बन चुका है।
थानों में अपराध का भाव, अस्पतालों में इलाज का रेट, परिवहन में क्लियरेंस की कीमत, और खाद में मुनाफे की सीमा — सबका हिसाब तय है।
जनता के कर से बनी व्यवस्था, जनता के ही धन को चूसने लगी है। जब किसी ईमानदार अधिकारी की नियुक्ति होती है, तो वही सिस्टम उसे निगल लेता है।
🙏 सनातन की सरकार, पर नीति धर्म कहां है?
सरकारें धर्म के नाम पर जयकारे लगवा रही हैं — “सनातन की सरकार है, सनातन की जयकारा हो।”
पर जब जनता की समस्याएं, भ्रष्टाचार की लहरें और अन्याय की आवाजें उठती हैं, तो धर्म मौन हो जाता है।
धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं — नीति, न्याय और कर्तव्य का पालन भी धर्म ही है। जब सरकारें इस धर्म को भूल जाएं, तो समाज की जड़ें कमजोर हो जाती हैं।
🕯️ अब प्रश्न जनता के सामने है — चुप रहें या बदलाव मांगे?
भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उन्हें काटने के लिए केवल आदेश नहीं, आंदोलन चाहिए।
जब तक जनता “व्यवस्था” से सवाल नहीं करेगी, तब तक यह “बाजार” चलता रहेगा।
समय आ गया है कि समाज सवाल पूछे —
“कब तक हम अपने ही पसीने की कमाई को रिश्वत के पानी में बहाते रहेंगे?”





