रवि सीजन में डीएपी खाद की किल्लत से किसान परेशान — प्रशासन और समितियों की उदासीनता पर उठे सवाल
रवि सीजन शुरू होते ही किसानों के सामने खाद की भारी समस्या खड़ी हो गई है। क्षेत्र के अनेक पहाड़ी इलाकों — मानव तहसील, सिरमौर, त्यौंथर, नईगढ़ी, हनुमान, मऊगंज सहित आसपास के गांवों में — डीएपी (DAP 18-46) खाद की भारी किल्लत देखने को मिल रही है। खेत बारिश निकलते ही बोआई के लिए तैयार हैं, लेकिन किसानों को खाद नहीं मिल पा रही है।
समितियों में खाद का स्टॉक खत्म है, जिससे किसानों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। वहीं, प्राइवेट विक्रेता मौके का फायदा उठाकर मनमाने दाम वसूल रहे हैं। बताया जा रहा है कि सरकारी रेट की तुलना में बाजार में डीएपी खाद की बोरी डबल रेट यानी लगभग दोगुने मूल्य पर बेची जा रही है।
किसानों का कहना है कि “हम समिति से सस्ती दर पर खाद लेते थे, लेकिन अब वहां खाद नहीं है। मजबूर होकर हमें प्राइवेट दुकानों से महंगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है।”
सूत्रों के अनुसार, रीवा-मऊगंज जिले में कुछ दुकानदार 18- 46 डीएपी की बोरियों में सुपर फॉस्फेट खाद भरकर बेच रहे हैं, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। फिर भी, प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारी इस पर आंखें मूंदे हुए हैं।
जानकारी के अनुसार, यूरिया कंपनी की 2024 बैच की खाद और 2025 बैच की खाद के रेट में स्पष्ट अंतर है। दोनों बोरियों पर अंकित मूल्य में फर्क दिखाई देता है, लेकिन निरीक्षण की कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा रही।
किसानों और ग्रामीणों में चर्चा है कि कृषि विभाग के कुछ कर्मचारी और अधिकारी प्राइवेट विक्रेताओं से मिलीभगत कर जांच के नाम पर वसूली करते हैं। जिससे बाजार में अव्यवस्था और मिलावटखोरी को बढ़ावा मिल रहा है।
जनप्रतिनिधि और स्थानीय प्रशासन के उदासीन रवैये से अन्नदाता निराश हैं। किसानों का कहना है कि “हम खेत तैयार कर चुके हैं, पर खाद के बिना बोआई कैसे करें?”
सरकार भले ही “अन्नदाता सर्वोपरि” का नारा देती हो, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि किसान आज भी कर्ज, महंगाई और प्रशासनिक लापरवाही के बीच पिस रहा है।
अंत में किसानों की पुकार:
“सरकार और प्रशासन तुरंत खाद की आपूर्ति सुनिश्चित करे, समितियों में स्टॉक बहाल किया जाए, मिलावटखोरी पर सख्त कार्रवाई हो — ताकि अन्नदाता अपने खेतों में रवि की फसल बो सके और देश की अन्न सुरक्षा बरकरार रहे।”



