रीवा, मध्य प्रदेश — विंध्य प्रदेश की ऐतिहासिक राजधानी रीवा, जो बहादुरी, संगीत, संस्कृति और प्राचीन धरोहरों के लिए प्रसिद्ध रही है, आज एक ऐसे संकट से जूझ रही है जिसकी आग विज्ञान के युग में और भड़कती जा रही है। प्रदेश में मेडिकल सिरप, नशीली गोलियों और अन्य ड्रग्स के अवैध कारोबार ने रीवा को बदनाम कर प्रथम पंक्ति में ला खड़ा किया है।
स्थानीय जनमानस में यह चर्चा आम हो चली है कि नशे का यह थोक व्यापार आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है। कहीं दबंगई, तो कहीं राजनीतिक प्रभाव — सत्ता और विपक्ष दोनों ओर ऐसे तत्व मौजूद बताए जाते हैं, जिनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संरक्षण का संदेह लगातार गहराता जा रहा है।
खाकी पर सवाल, मगर ईमानदार भी कम नहीं
यह सच है कि पुलिस विभाग में कई ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी हैं, जिनकी सक्रियता से कानून व्यवस्था कई बार मजबूत दिखाई देती है। लेकिन इसके समानांतर यह भी चर्चा तेज है कि विभाग के कुछ ‘जयचंद्र’— यानी अंदरूनी गद्दार — नशा कारोबारियों को संरक्षण और सुरक्षा दे रहे हैं।
जनता का सवाल है कि ये चिन्हित “जयचंद्र” आखिर कौन हैं? क्या इन पर कार्रवाई हुई? क्या इन्हें हटाया गया? या फिर वे अब भी उसी कुर्सी पर बैठे हैं?
जब तक इनकी पहचान सार्वजनिक नहीं होती, तब तक यह संघर्ष अधूरा ही रहेगा।
नशेड़ियों पर कार्रवाई, पर असली आपूर्तिकर्ता पर चुप्पी!
अब तक की कार्रवाई में यह देखा गया है कि पुलिस केवल नशा करने वालों और छोटे स्तर के पकड़े गए व्यक्तियों को जेल भेजकर प्रकरण तैयार कर लेती है और सफलता का दावा कर देती है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि—
नशा आता कहां से है? कौन इसकी आपूर्ति कर रहा है? किन चैनलों से लाखों रुपये की यह खेप जिले में प्रवेश करती है?
आज तक इसका ठोस खुलासा न होना पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
IG गौरव सिंह राजपूत की सक्रियता ने बढ़ाई दबाव
रीवा ज़ोन के आईजी गौरव सिंह राजपूत की सख्त निगरानी और लगातार निर्देशों के बाद रीवा संभाग के जिलों में ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू हुई।
उनकी सक्रियता न होती तो क्या इतनी तेज़ कार्रवाई संभव थी? शायद नहीं। यह बात आम लोग भी मानने लगे हैं।
लेकिन सवाल अब भी वही है—
यदि IG स्तर पर इतनी सख्ती है, तो ज़मीनी स्तर पर आदेश असरदार क्यों नहीं हो पा रहे? अधीनस्थ कर्मचारियों की कमजोरी या मिलीभगत पर कार्रवाई क्यों नहीं?
फोरलेन-30 और हाईवे पर अवैध कारोबार बेखौफ
राष्ट्रीय राजमार्ग फोरलेन-30 और शहर के प्रमुख मार्गों पर मेडिकल नशा, शराब और ड्रग्स की पाइकारी खुलेआम जारी रहने की शिकायतें मिल रही हैं।
थोड़े दिनों के लिए दबाव बनाने के बाद फिर पुराना धंधा उसी घर, उसी स्थान और उसी संरक्षण में शुरू हो जाता है।
यह स्पष्ट दिखाता है कि कहीं न कहीं ऐसी मजबूत सुरक्षा-ढाल है, जिनके हटे बिना यह व्यापार रुकने वाला नहीं।
कलेक्टर व विभागीय अधिकारियों के आदेश हवा में?
जिला कलेक्टर, परिवहन विभाग या स्थानीय प्रशासन द्वारा समय-समय पर जारी आदेश कागजों तक ही सीमित दिखाई देते हैं।
ना तो अवैध कारोबार थमता है और ना ही संरक्षक तत्वों पर कोई ठोस कार्रवाई दिखती है।
अब निगाहें गृह मंत्री और सरकार पर
सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
क्या मध्यप्रदेश के गृह मंत्री, जिनके पास सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी है, इस जाल को भेद पाएंगे?
क्या खुफिया तंत्र ऐसे संरक्षक अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान कर सरकार को रिपोर्ट सौंपेगा?
क्या सरकार केवल आदेश और घोषणाओं से आगे बढ़कर सख्त कार्रवाई करेगी?
जनता का धैर्य टूट रहा है। अब लोग सिर्फ बयान नहीं, ठोस परिणाम चाहते हैं।
यदि प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन ने इस बार निर्णायक कदम नहीं उठाए, तो नशे का यह कारोबार आने वाली पीढ़ियों के लिए भयावह संकट बनकर खड़ा होगा।


