रीवा–मऊगंज में पोषण आहार योजना में गड़बड़ी के गंभीर आरोप — बच्चों के हिस्से का निवाला डकार रहे भ्रष्ट तंत्र के लोग, जांच की मांग तेज
महिला एवं बाल विकास विभाग की पोषण योजनाओं में हज़ारों केंद्रों पर सिर्फ कागज़ी खानापूर्ति — साझा चूल्हा व स्कूल पोषण कार्यक्रम का धन महीनों से बकाया, जांच करने वाले अधिकारी भी दबाव में
मध्य प्रदेश शासन के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित रुचिकर भोजन व पोषण आहार योजना में रीवा–मऊगंज जिले में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं।
प्रदेश और केंद्र सरकार द्वारा कुपोषण मिटाने के लिए विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से चल रही योजनाओं का लाभ ग्रामीण अंचलों तक पहुँचाने के दावे तो खूब किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बच्चों और गर्भवती माताओं के हिस्से का पोषण आज भी कागज़ों में ही सीमित है।
स्थानीय सूत्रों और कुछ विभागीय कर्मचारियों के अनुसार, जिले के अनेक आंगनबाड़ी केंद्रों तथा विद्यालयों में साझा चूल्हा योजना और रुचिकर भोजन वितरण कार्यक्रम के नाम पर महीनों से पैसा नहीं पहुँचा, और जहाँ पहुँचा भी, वहाँ भोजन वितरण की व्यवस्था मात्र औपचारिकता बनकर रह गई है।
कागज़ों में जारी करोड़ों, जमीनी हकीकत में सिर्फ खिचड़ी
रीवा–मऊगंज जिले में हर महीने करोड़ों रुपये पोषण आहार और साझा चूल्हा योजना के तहत खर्च दिखाए जाते हैं। परंतु ग्रामीण इलाकों में जाकर देखें तो स्थिति इसके बिलकुल उलट है।
अधिकांश केंद्रों पर बच्चों को रोटी, चावल, दाल या खिचड़ी जैसी साधारण चीजें दी जा रही हैं, जबकि “रुचिकर पौष्टिक भोजन” नाम की योजना का उद्देश्य ही बच्चों को संतुलित आहार देना था।
कई आंगनबाड़ी सहायिकाओं ने बताया कि मई 2025 से अब तक साझा चूल्हा का पैसा नहीं मिला, और स्कूलों में मिलने वाला पोषण निधि भी सितंबर 2025 से अटका हुआ है।
इसके बावजूद, विभागीय रजिस्टरों में वितरण पूरा दिखाया जा रहा है।
जांच से डरते अधिकारी, दबाव में प्रशासन
मऊगंज के देवतालाब क्षेत्र में तो हालात इतने खराब हैं कि अधिकारी जांच करने से कतराते हैं। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि —
“अगर जांच की तो हस्तांतरण या कार्रवाई तय है। इसलिए सब चुप हैं।”
वहीं गढ़ कन्या प्राथमिक पाठशाला की प्रधानाध्यापिका ने जब स्कूल में भोजन वितरण में गड़बड़ी की लिखित शिकायत की, तो उन पर ही विभागीय कार्रवाई कर दी गई।
इस घटना ने साफ कर दिया कि जो भी सच्चाई उजागर करने की कोशिश करता है, उसे ही निशाना बना लिया जाता है।
भ्रष्टाचार का जाल: नेताओं–अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप
आंगनबाड़ी और विद्यालयों में पोषण सामग्री वितरण का जिम्मा विभिन्न महिला स्वसहायता समूहों को दिया गया है, लेकिन इनमें से अधिकांश समूह राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों या अधिकारियों के करीबियों द्वारा संचालित हैं।
जिला पंचायत, जनपद पंचायत और ब्लॉक परियोजना कार्यालयों में इन समूहों की मिलीभगत से फर्जी बिलिंग, सामग्री की कम आपूर्ति और रिकॉर्ड में हेरा-फेरी आम बात हो चुकी है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि “यह योजना कुपोषण नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार पोषण का माध्यम बन चुकी है।”
अभिभावकों की पीड़ा — बच्चों का हक छिन रहा
गांवों में अभिभावक परेशान हैं कि उनके बच्चों को वादा किया गया पौष्टिक भोजन कभी नहीं मिला।
एक अभिभावक ने बताया —
“कागज में सब कुछ मिलता है, पर बच्चे को रोज़ वही सूखी रोटी या खिचड़ी मिलती है।”
कुपोषण से लड़ने की यह योजना अब ग्रामीण समाज में विश्वास की कमी और भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में देखी जा रही है।
कार्रवाई की मांग तेज — स्वतंत्र जांच की जरूरत
स्थानीय सामाजिक संगठनों, जागरूक नागरिकों और अभिभावकों ने मांग की है कि इस पूरे घोटाले की स्वतंत्र जांच किसी विशेष एजेंसी या ईमानदार अधिकारी से कराई जाए।
मांगें इस प्रकार रखी गई हैं —
1. साझा चूल्हा और विद्यालय पोषण योजना की बैंकिंग लेन-देन की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
2. सभी आंगनबाड़ी और विद्यालय केंद्रों पर अचानक निरीक्षण और भोजन सैंपल जांच कराई जाए।
3. दोषी अधिकारियों और समूह संचालकों की संपत्ति जांच की जाए और उन्हें निलंबित किया जाए।
4. योजना का पूरा डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए, ताकि वास्तविक वितरण पर निगरानी रखी जा सके।
रीवा–मऊगंज जिले की यह तस्वीर पूरे प्रदेश की पोषण योजनाओं की पोल खोलती है।
बच्चों के हक का भोजन यदि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है तो यह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय अपराध है।
सरकार को चाहिए कि वह इस पूरे तंत्र को पारदर्शी बनाए और उन “कुंभकरण अधिकारियों” पर कड़ी कार्रवाई करे, जो गरीब बच्चों के निवाले पर राजनीति और लाभ का खेल खेल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों अधिकाश आंगनवाड़ीयो में काल्पनिक बच्चों के एडमिशन और कागजों में गर्भवती महिलाओं को पोषण आहार वितरण की जा रही है। हर योजना अब भ्रष्टाचार की भेट चढ़ चुकी है। किंतु अभी तक कोई जांच नहीं हुई।



