महिला-बाल विकास की योजनाओं में भारी अनियमितताएँ: गंगेव ब्लॉक में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम कागज़ों तक सीमित
रीवा/गंगेव। सरकार द्वारा कुपोषण दूर करने के उद्देश्य से लागू महिला एवं बाल विकास विभाग की योजनाएँ जमीनी स्तर पर भारी अनियमितताओं और सत्ता–सह सुरक्षा के कारण अपनी मूल भावना से भटकती नज़र आ रही हैं। विश्व बैंक सहायता प्राप्त इस योजना का लक्ष्य गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं, किशोरी बालिकाओं तथा 3 से 6 वर्ष आयु के बच्चों को पोषण उपलब्ध कराना है, किंतु गंगेव विकासखंड में स्थिति बिल्कुल उलट दिख रही है।
5–10% ही लागू, 90% योजनाएँ कागज़ों में पूरी!
स्थानीय ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों के अनुसार, विभिन्न सरकारी योजनाएँ धरातल पर मात्र 5 से 10% तक ही क्रियान्वित हो पा रही हैं, शेष लाभ भ्रष्ट तंत्र, निजी जोड़-तोड़ और सत्ता संरक्षण में लगे समूहों को मिलता जा रहा है।
गरीबी रेखा के कार्ड पर संपन्न वर्ग का कब्ज़ा
गंगेव क्षेत्र, जो मध्यप्रदेश–उत्तरप्रदेश की सीमा पर स्थित है, यहाँ स्वयं सहायता समूहों के गठन में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ियाँ सामने आई हैं।
संपन्न परिवार गरीबी रेखा के कार्ड बनवाकर समूहों में शामिल हो रहे हैं।
कई समूहों पर वर्षों से वही लोग काबिज़ हैं, जबकि नियम के अनुसार हर दो वर्ष में अध्यक्ष, सचिव व कोषाध्यक्ष का बदलना अनिवार्य है।
नियम विरुद्ध: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता खुद बना रहीं समूह संचालक
शासन के अनुसार आंगनबाड़ी सहायिका, कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि तथा विभागीय कर्मचारी किसी भी स्थिति में समूह संचालक नहीं हो सकते।
इसके बावजूद —
गंगेव ब्लॉक की कई पंचायतों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता स्वयं अपना समूह चला रही हैं
और खाद्यान्न वितरण में अपने ही परिवार के सदस्यों को लाभ पहुंचा रही हैं।
आंगनबाड़ी में 10% उपस्थिति, रिकॉर्ड में 80%
जमीन पर वास्तविकता और रिकॉर्ड में दर्ज आँकड़ों में बड़ा अंतर सामने आ रहा है—
अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्रों में 5 से 10% बच्चे ही उपस्थित पाए जाते हैं।
लेकिन पोषण ट्रैकर पर 80% उपस्थिति दर्ज की जाती है।
पर्यवेक्षक 60% उपस्थिति दर्शाते हैं, इसलिए समूहों को 60% उपस्थिति का भुगतान मिलता है,
जबकि खाद्यान्न 80% के हिसाब से उठाया जाता है।
रसोइयों के नाम काल्पनिक – काम कोई और, वेतन किसी और को
जाँच में यह भी सामने आया है कि—
कई केंद्रों में रसोइयों के नाम कागज़ों में दर्ज हैं,
जबकि खाना दूसरी महिलाएँ बनाती हैं और वेतन किसी और को दे दिया जाता है।
केंद्रों पर ताले, कार्यकर्ता रीवा में रहकर काम!
गांवों में कई आंगनबाड़ी केंद्र पूरे दिन ताले लगे मिलते हैं।
कार्यकर्ता स्वयं रीवा शहर में रहकर काम करती हैं,
और ग्रामीण केंद्रों में 3 से 4 हजार रुपये में दूसरी महिलाओं को रख दिया जाता है।
निरीक्षण के नाम पर वाहन, डीज़ल और भत्ते का खर्च तो बनाया जाता है,
किंतु वास्तविक निरीक्षण शायद ही कभी किया जाता है।
विश्व बैंक की करोड़ों की योजना पर मनमानी का साया
कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत —
पौष्टिक आहार, रुचिकर भोजन और खाद्यान्न पर हर माह करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं।
वहीं वेतन व अन्य भत्तों के नाम पर भी करोड़ों की राशि निकल रही है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि इस पूरे तंत्र पर सत्ताधारी दल से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों का दबदबा है, जिसके कारण अधिकारी कार्रवाई से बचते हैं।
जनता में रोष, सामाजिक संगठनों से हस्तक्षेप की मांग
क्षेत्रवासियों का कहना है कि —
सरकार जिन बच्चों और माताओं के पोषण की बात करती है,
वहीं योजनाएँ भ्रष्टाचार और गठजोड़ की भेंट चढ़ रही हैं।
उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार आयोग और उच्च अधिकारियों से इस पर गंभीरता से संज्ञान लेने की मांग की है।
ब्लॉक परियोजना अधिकारी से संपर्क असफल
इस विषय पर जानकारी के लिए गंगेव के ब्लॉक परियोजना अधिकारी अर्पित पाठक से संपर्क करने का प्रयास किया गया, किंतु फोन रिसीव नहीं किया गया। इसके कारण विभाग का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका।
मध्यप्रदेश के कई जिलों में समान स्थिति
यह स्थिति केवल रीवा जिले तक सीमित नहीं, बल्कि मऊगंज सहित प्रदेश के अधिकांश जिलों में इसी तरह की अनियमितताएँ देखी जा रही हैं।
स्थानीय स्तर पर जुड़े लगभग 80 से 90% लोग सत्ताधारी दल या प्रभावशाली समूहों से जुड़े होने के कारण कार्यवाहियाँ अक्सर कागज़ों तक ही सीमित रह जाती हैं।

