हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: झूठी एफआईआर कराने वालों पर अनिवार्य रूप से दर्ज होगा केस, नहीं तो पुलिस अफसरों पर होगी कार्रवाई
प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झूठे मुकदमों और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला आदेश पारित किया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आता है कि किसी एफआईआर की नींव झूठी या भ्रामक सूचना पर रखी गई थी, तो विवेचना अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले व्यक्ति के खिलाफ झूठी गवाही और पुलिस को गुमराह करने के आरोप में लिखित परिवाद दर्ज कराए। ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ स्वयं आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।
यह ऐतिहासिक आदेश माननीय न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने 14 जनवरी 2026 को “उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य” वाद में पारित किया है। अदालत का यह फैसला फर्जी मुकदमों की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है।
फर्जी मुकदमों पर हाईकोर्ट की सख्ती
याचिका BNSS की धारा 528 (पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482) के तहत दाखिल की गई थी, जिसमें याची ने अपने खिलाफ दर्ज कथित फर्जी मुकदमे और उस पर मजिस्ट्रेट द्वारा लिए गए संज्ञान को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि कई मामलों में पुलिस बिना ठोस साक्ष्यों के या भ्रामक तथ्यों के आधार पर चार्जशीट दाखिल कर देती है, जिससे निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक रूप से न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस को झूठी सूचना देता है, तो यह न केवल अपराध है बल्कि पुलिस अधिकारी की कानूनी जिम्मेदारी भी बनती है कि वह ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करे।
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय
हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 212 और 217 (पूर्व में IPC की धारा 177 और 182) का हवाला देते हुए कहा कि झूठी सूचना देने वाले व्यक्ति के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराना अनिवार्य है।
साथ ही कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि विवेचक, थाना प्रभारी, क्षेत्राधिकारी या लोक अभियोजक इन निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ BNS की धारा 199(बी) (पूर्व में IPC की धारा 166A(b)) के तहत आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।
अवमानना की कड़ी चेतावनी
आदेश के पैरा 50 में हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि पुलिस या न्यायिक अधिकारी इस आदेश का अक्षरशः पालन नहीं करते हैं, तो यह अदालती अवमानना मानी जाएगी। पीड़ित व्यक्ति ऐसे मामलों में सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
60 दिन में आदेश का अनुपालन अनिवार्य
कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और सभी न्यायिक अधिकारियों को आदेश दिया है कि इस फैसले की तिथि से 60 दिनों के भीतर इन निर्देशों का पूर्ण रूप से पालन सुनिश्चित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राज सिंह (1998) के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि झूठी सूचना से जुड़े अपराधों में लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना अदालत संज्ञान नहीं ले सकती।
मजिस्ट्रेट की भूमिका भी तय
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब पुलिस किसी मामले में यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) लगाती है कि आरोप झूठे या भ्रामक हैं, तो मजिस्ट्रेट तब तक उस रिपोर्ट को स्वीकार न करें जब तक उसके साथ झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ लिखित शिकायत संलग्न न हो। यदि प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की जाती है, तो पुलिस की शिकायत पर कार्यवाही तब तक स्थगित रहेगी, जब तक प्रोटेस्ट पिटीशन का निस्तारण नहीं हो जाता।
असंज्ञेय अपराधों पर अहम टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि असंज्ञेय अपराधों में पुलिस द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को स्टेट केस नहीं बल्कि परिवाद माना जाएगा और पुलिस अधिकारी को ही परिवादी समझा जाएगा। कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा असंज्ञेय अपराध में पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञेय अपराध की तरह संज्ञान लेने के आदेश को कानूनन गलत ठहराया।
वैवाहिक विवाद से जुड़ा मामला
यह पूरा मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ क्वार्सी थाना, अलीगढ़ में IPC की धारा 504 और 507 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि पत्नी विदेश में रहते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से पति और बेटी को बदनाम कर रही है तथा भारत लौटने पर जान से मारने की धमकी दे रही है।
पुलिस जांच में आरोप झूठे पाए गए और अंतिम रिपोर्ट लगा दी गई, लेकिन मजिस्ट्रेट ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार कर मामले को स्टेट केस के रूप में चलाने का आदेश दे दिया।
हाईकोर्ट ने सीजेएम का आदेश रद्द किया
हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 504 और 507 असंज्ञेय और जमानती अपराध हैं, ऐसे में मजिस्ट्रेट द्वारा इन्हें स्टेट केस के रूप में दर्ज करना कानून के विपरीत था। अदालत ने अलीगढ़ सीजेएम का संज्ञान आदेश रद्द करते हुए मामला पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर कानून के अनुसार नया आदेश पारित किया जाए।


















