गढ़ में शासकीय भूमि हड़पने की साजिश राजस्व अमले से लेकर रसूखदारों तक सवालों के घेरे में
रीवा जिले के मनगवां अनुभाग अंतर्गत ग्राम गढ़ में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर एक बड़ा और गंभीर खुलासा सामने आया है। ग्राम गढ़ स्थित खसरा नंबर 77, जिसका कुल रकबा 0.656 हेक्टेयर दर्ज है, आज भू-माफियाओं और रसूखदारों के निशाने पर है। आरोप है कि करोड़ों रुपये मूल्य की इस बेशकीमती शासकीय जमीन को योजनाबद्ध तरीके से निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची जा रही है, जिसमें राजस्व विभाग के मैदानी अमले से लेकर जनप्रतिनिधियों तक की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है।
बाजार के बीचों-बीच, इसलिए भू-माफिया की नजर
विवादित खसरा संख्या 77 राष्ट्रीय राजमार्ग और ग्राम के मुख्य बाजार के बीच स्थित है। इस भूमि पर वर्तमान में
शासकीय हाई स्कूल भवन
पुराने थाने का भवन
मौजूद है, जबकि शेष लगभग 2000 से 3000 वर्ग फुट भूमि खाली बताई जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि व्यावसायिक दृष्टि से यह भूमि सोने के भाव की है, यही कारण है कि भू-माफिया इसे हथियाने के लिए हरसंभव हथकंडे अपना रहे हैं।
कंप्यूटरीकरण बना साजिश का हथियार
ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि सन 2000 में जब खसरा अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण हुआ, उसी दौरान तकनीकी खामियों और कूटनीतिक चालबाजियों का फायदा उठाकर शासकीय संस्थाओं के नाम रिकॉर्ड से गायब कर दिए गए।
आज उसी त्रुटि को आधार बनाकर भू-माफिया यह दावा कर रहे हैं कि भूमि शासकीय नहीं, बल्कि निजी है।
पटवारी-कानूनगो पर सीधा आरोप
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि स्थानीय पटवारी और कानूनगो भू-माफियाओं के साथ मिलकर रिकॉर्ड में हेराफेरी कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि राजस्व अमला निष्पक्ष होता तो आज तक इस भूमि पर अतिक्रमण की हिम्मत किसी की नहीं होती। बल्कि उल्टा, अधिकारियों की चुप्पी और ढिलाई ने भू-माफियाओं के हौसले बुलंद कर दिए हैं।
जनप्रतिनिधियों की संलिप्तता के आरोप
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब यह बात सामने आई कि जनपद और विधानसभा स्तर के कुछ जनप्रतिनिधि भी इस खेल में पर्दे के पीछे से सक्रिय हैं। आरोप है कि राजनीतिक संरक्षण के चलते भू-माफिया प्रशासनिक कार्रवाई से बेखौफ होकर आगे बढ़ रहे हैं।
पंचनामा: केवल सार्वजनिक उपयोग की मांग
स्थानीय सरपंच और ग्रामीणों द्वारा तैयार किए गए पंचनामे में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि खसरा नंबर 77 की शेष भूमि का उपयोग
स्कूल के विस्तार
थाना परिसर के विस्तार
जैसे सार्वजनिक और शासकीय कार्यों के लिए ही किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह भूमि निजी हाथों में गई तो आने वाली पीढ़ियों से सार्वजनिक संपत्ति छीन ली जाएगी।
जांच हुई, लेकिन भरोसा टूटा
मामला कलेक्टर और एसडीएम तक पहुंचने के बाद जांच के आदेश तो दिए गए, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि जो जांच रिपोर्ट सामने आई है वह पक्षपातपूर्ण और अधूरी सच्चाई पर आधारित है।
ग्रामीणों का कहना है कि
जमीनी हकीकत को दबाया गया
अतिक्रमणकारियों को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया गया
जबकि पूर्व में इसी भूमि को लेकर गांव में तनाव और हिंसक झड़पें भी हो चुकी हैं, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा बना रहता है।
कागजों में बेदखली, जमीन पर माफिया?
राजस्व विभाग अब बेदखली की कागजी प्रक्रिया शुरू करने की बात कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ फाइलों तक ही सीमित रहेगी या वास्तव में जमीन पर भी दिखाई देगी?
ग्रामीणों का साफ कहना है कि जब तक रसूखदारों और मिलीभगत करने वाले अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक शासकीय भूमि सुरक्षित नहीं रह सकती।
फिलहाल, ग्राम गढ़ की यह करोड़ों की शासकीय भूमि प्रशासन की ईमानदारी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है। अब देखना यह है कि प्रशासन भू-माफियाओं पर शिकंजा कसता है या फिर शासकीय जमीन एक और घोटाले की भेंट चढ़ जाती है।



