ग्रामीणों पर बिजली बिलों का कहर, ₹100 से लाखों तक पहुँचे बिल, जनता में गहराता आक्रोश
मध्य प्रदेश के ग्रामीण अंचलों, विशेषकर रीवा और मऊगंज जिलों में इन दिनों बिजली के बिल आम जनता की कमर तोड़ते नजर आ रहे हैं। जिन ग्रामीण परिवारों का मासिक बिजली बिल कभी ₹100 के आसपास हुआ करता था, वे आज अचानक हजारों और कहीं-कहीं लाखों रुपये के बिल देखकर स्तब्ध हैं। स्थिति यह बन गई है कि ग्रामीण उपभोक्ता खुद को व्यवस्था का शिकार और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
₹100 की योजना से लेकर वर्तमान की कड़वी सच्चाई
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ग्रामीण उपभोक्ताओं को न्यूनतम ₹100 मासिक बिजली बिल की सुविधा दी गई थी, जिसे बाद में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौ
हान के शासनकाल में भी काफी हद तक जारी रखा गया। इस योजना से ग्रामीणों को बड़ी राहत मिली थी और बिजली का उपयोग उनके बजट में बना हुआ था।
लेकिन वर्तमान मोहन यादव सरकार के लगभग एक वर्ष के कार्यकाल में हालात तेजी से बदले हैं। उपभोक्ताओं का आरोप है कि अब बिजली विभाग द्वारा बिना स्पष्ट कारण और जांच के 15 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक के बिल थमाए जा रहे हैं। कई मामलों में तो वर्षों की खपत एक साथ जोड़कर बिल जारी किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
भावनात्मक मुद्दों की राजनीति में दब गया जनसरोकार
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनावी समय में सनातन, पाकिस्तान, चीन और हिंदू-मुसलमान जैसे भावनात्मक और राष्ट्रवादी मुद्दों की राजनीति के बीच आम जनता से जुड़े मूलभूत सवाल हाशिए पर चले गए। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार और प्रशासन अवैध विद्युत उपयोग रोकने में पूरी तरह विफल साबित हो रहे हैं।
एक ओर कई बस्तियों में बिना मीटर के खुलेआम बिजली का उपयोग हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वैध कनेक्शनधारियों पर पूरे ट्रांसफार्मर की खपत का बोझ डाल दिया जा रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है,
"हम घर में 5–10 वाट के चंद बल्ब और पंखा चलाते हैं, लेकिन बिल ऐसे भेजे जा रहे हैं जैसे कोई फैक्ट्री चला रहे हों। न अधिकारी जांच करते हैं, न मीटर लगाते हैं और न ही हमारी सुनवाई होती है।"
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल
इस गंभीर संकट के बीच जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी जनता को खटक रही है। रीवा और मऊगंज क्षेत्र के न तो विधायक और न ही सांसद खुलकर ग्रामीणों की इस समस्या को लेकर सामने आए हैं। वहीं विपक्ष में बैठी कांग्रेस पर भी आरोप लग रहे हैं कि वह अपनी ही पूर्ववर्ती सरकार की सस्ती बिजली योजना को मुद्दा बनाकर प्रभावी आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रही है।
क्षेत्र में यह चर्चा भी आम है कि कई नेता अपने निजी हितों, कथित काली कमाई और राजनीतिक समीकरणों को बचाने के लिए जनता की पीड़ा से आँखें मूँदे हुए हैं।
अवैध खपत का बोझ ईमानदार उपभोक्ताओं पर
ग्रामीणों का आरोप है कि विद्युत मंडल के अधिकारी ट्रांसफार्मर पर होने वाली कुल बिजली खपत का अनुमान लगाकर, उसे सीमित संख्या में वैध कनेक्शनधारियों के बिल में जोड़ रहे हैं। अवैध रूप से बिजली जलाने वालों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही, जबकि प्रधानमंत्री आवास योजना और लाड़ली बहना योजना का लाभ लेने वाले गरीब परिवार बिजली बिल के इस अतिरिक्त बोझ से बुरी तरह त्रस्त हैं।
जन-आंदोलन की आहट
ग्रामीण अंचलों में असंतोष धीरे-धीरे आक्रोश में बदलता नजर आ रहा है। जनता अब उन वादों और नारों का हिसाब मांग रही है, जिनके नाम पर उनसे वोट लिए गए थे। यदि जल्द ही बिजली बिलों की विसंगतियों को दूर नहीं किया गया, मीटर व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई और अवैध खपत पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आक्रोश आने वाले समय में बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।


