रीवा में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल: सीमांकन, खसरा सुधार और भू-अभिलेखों में वर्षों से लंबित प्रकरणों पर उठे प्रश्न
रीवा। जिले में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर आम नागरिकों में गहरा असंतोष उभर कर सामने आ रहा है। आरोप है कि सीमांकन, कंप्यूटर खसरा सुधार, भूखंड दर्ज करने तथा भूमि अभिलेखों के अद्यतन जैसे कार्य बिना “सेवा शुल्क” या राजनीतिक सिफारिश के आगे नहीं बढ़ते। कई मामलों में 10 से 15 वर्षों से प्रकरण लंबित पड़े होने की शिकायतें मिल रही हैं, जिससे ग्रामीण और गरीब तबके के लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
सीमांकन और खसरा सुधार में वर्षों की देरी
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सीमांकन (डिमार्केशन) और कंप्यूटर खसरा सुधार के प्रकरण वर्षों से विचाराधीन बताए जा रहे हैं। कई परिवारों का आरोप है कि बारिश के मौसम में भूमि विवाद और अधिक बढ़ जाते हैं, क्योंकि सीमांकन स्पष्ट न होने से खेतों की सीमाएं विवादित हो जाती हैं। “आना नक्षत्र” में बारिश के दौरान खेतों की स्थिति बदलने से पुराने विवाद फिर से उभर आते हैं, परंतु राजस्व रिकॉर्ड में सुधार न होने से समस्या जस की तस बनी रहती है।
सूत्रों का कहना है कि बिना अतिरिक्त राशि दिए या राजनीतिक सिफारिश के आवेदन फाइलों में दबे रह जाते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, वे जमीन गिरवी रखकर या कर्ज लेकर कथित सेवा शुल्क चुकाने को मजबूर हो जाते हैं।
गरीब किसानों पर आर्थिक बोझ
ग्रामीणों का कहना है कि सीमांकन और नामांतरण जैसे मूलभूत राजस्व कार्यों के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई मामलों में पटवारी से लेकर संबंधित अधिकारियों तक फाइल पहुंचने में महीनों लग जाते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह प्रक्रिया और भी कठिन हो जाती है। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि वर्षों से लंबित प्रकरणों का निराकरण केवल “सिफारिश” या “सेवा शुल्क” के आधार पर ही हो पाता है।
राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक उदासीनता के आरोप
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि राजनीतिक सिफारिश वाले मामलों को प्राथमिकता मिलती है, जबकि सामान्य आवेदकों की सुनवाई नहीं होती। इस कारण आम जनता में सरकार, जनप्रतिनिधियों और विपक्ष—सभी के प्रति आक्रोश पनप रहा है। लोगों का कहना है कि यदि राजस्व अभिलेख समय पर अपडेट नहीं होंगे तो भूमि विवाद, न्यायालयीन प्रकरण और सामाजिक तनाव बढ़ते रहेंगे।
कलेक्टर से जांच की मांग
जिले के नागरिकों ने जिला कलेक्टर रीवा से मांग की है कि राजस्व विभाग में लंबित सीमांकन, कंप्यूटर खसरा सुधार और भू-अभिलेख संशोधन के प्रकरणों की गंभीरता से जांच कराई जाए। यह भी पूछा जा रहा है कि आखिर 10 से 15 वर्षों से लंबित फाइलों का निस्तारण क्यों नहीं हो पाया?
नागरिकों का सुझाव है कि:
लंबित प्रकरणों की सार्वजनिक सूची जारी की जाए।
समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था लागू की जाए।
ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम को प्रभावी बनाया जाए।
शिकायत निवारण तंत्र को पारदर्शी बनाया जाए।
पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजस्व विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, तो न केवल भूमि विवाद कम होंगे बल्कि प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास भी मजबूत होगा। डिजिटल रिकॉर्ड व्यवस्था के बावजूद यदि कंप्यूटर खसरा सुधार और सीमांकन में वर्षों लग रहे हैं, तो यह प्रणाली की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इन आरोपों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या लंबित प्रकरणों के निराकरण के लिए विशेष अभियान चलाया जाता है या नहीं। आम जनता को उम्मीद है कि जांच के बाद जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी और वर्षों से अटके मामलों को शीघ्र निपटाया जाएगा।
