राजस्व न्यायालय के स्थगन आदेश की अनदेखी: आखिर जिम्मेदार कौन?
राजस्व न्यायालयों द्वारा जारी किए जाने वाले स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) का उद्देश्य यथास्थिति बनाए रखना और विवादित स्थल पर किसी भी प्रकार के निर्माण या परिवर्तन को रोकना होता है। प्रत्येक आदेश में स्पष्ट रूप से उसकी प्रतिलिपि संबंधित पुलिस थाना, राजस्व विभाग तथा संबंधित पक्षकारों को प्रेषित की जाती है, ताकि आदेश का विधिवत पालन सुनिश्चित हो सके। किंतु व्यवहारिक स्थिति यह दर्शाती है कि कई मामलों में इन आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, जिससे कानून व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
पुलिस और राजस्व विभाग की भूमिका पर सवाल
सामान्यतः स्थगन आदेश की तामील (समन सर्विस) राजस्व विभाग के माध्यम से की जाती है। प्रत्येक ग्राम में हल्का पटवारी तथा चौकीदार पदस्थ रहते हैं, जिनकी जिम्मेदारी आदेश की जानकारी संबंधित पक्षों तक पहुंचाना और अनुपालन सुनिश्चित कराना होती है। साथ ही, पुलिस को प्रतिलिपि इसलिए दी जाती है ताकि किसी प्रकार की अवहेलना की स्थिति में तत्काल प्रभाव से कार्यवाही की जा सके।
किन्तु जनचर्चा में यह विषय उभर कर सामने आया है कि कई मामलों में स्थगन आदेश प्राप्त होने के बाद भी निर्माण कार्य जारी रहते हैं। पुलिस का यह तर्क कि “सूचना दे दी गई है, कार्य रोकना हमारा दायित्व नहीं है” प्रशासनिक दृष्टि से चिंताजनक माना जा रहा है। यदि पुलिस केवल सूचना देकर स्वयं को दायित्वमुक्त समझ ले, तो फिर आदेश की प्रतिलिपि देने का औचित्य क्या रह जाता है?
ताजा मामला: शासकीय विद्यालय परिसर में निर्माण
हालिया प्रकरण नायब तहसीलदार वृत्त गढ़, तहसील मनगवा, थाना गढ़ क्षेत्र का बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय माल के प्रांगण में सरपंच द्वारा पंचायत भवन का निर्माण कराया जा रहा था। इस पर राजस्व न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश जारी किया गया, किंतु निर्माण कार्य पूरी तरह से नहीं रुका।
माल बीट के प्रभारी पुलिस अधिकारी का कथित तर्क है कि उन्होंने सूचना दे दी है और प्रकरण दर्ज कर लिया गया है, किंतु कार्य को रुकवाना उनका दायित्व नहीं है। यह स्थिति स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
शिक्षा विभाग की निष्क्रियता
विद्यालय परिसर शासकीय संपत्ति है। ऐसे में शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने अधीनस्थ परिसरों की रक्षा करे। किंतु आरोप है कि विभागीय स्तर पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई गई। यदि किसी संस्था के रिकॉर्ड व्यवस्थित नहीं हैं या शासकीय संपत्ति पर अतिक्रमण हो रहा है, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय होना चाहिए। केवल वेतन प्राप्त कर दायित्व से विमुख रहना प्रशासनिक शिथिलता को दर्शाता है।
उच्च अधिकारियों से अपेक्षा
संभागीय आयुक्त एवं जिला कलेक्टर से जनप्रतिनिधियों और नागरिकों द्वारा यह अपेक्षा की जा रही है कि वे स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें—
स्थगन आदेश प्राप्त होने के बाद उसकी तामील और पालन सुनिश्चित कराने की अंतिम जिम्मेदारी किसकी होगी?
यदि आदेश की अवहेलना होती है, तो संबंधित अधिकारी पर क्या दंडात्मक कार्यवाही होगी?
क्या गरीब, मध्यमवर्गीय या संपन्न—सभी के लिए कानून समान रूप से लागू होगा?
थाना गढ़ एवं एसडीओपी मनगवा को स्थगन आदेश की प्रतिलिपि दिए जाने के बावजूद यदि कार्य नहीं रुका, तो यह प्रशासनिक समन्वय की कमी को दर्शाता है। घटनास्थल निरीक्षण के उपरांत भी तहसील स्तर पर अवमानना या आदेश उल्लंघन का प्रकरण पंजीबद्ध न होना चर्चा का विषय बना हुआ है।
कानून का सम्मान आवश्यक
यदि न्ययालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित नहीं कराया जाएगा, तो आमजन के मन में न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास उत्पन्न होना स्वाभाविक है। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। यदि किसी भी स्तर पर पुलिस या राजस्व विभाग संविधान की भावना के विपरीत कार्य करता प्रतीत होता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है।
पूर्व में मऊगंज जिले में उत्पन्न प्रशासनिक स्थितियों का उदाहरण अभी भी जनमानस में ताजा है। यदि समय रहते पारदर्शी और कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी परिस्थितियाँ व्यापक रूप ले सकती हैं।
अतः आवश्यक है कि शासन-प्रशासन स्पष्ट जवाबदेही तय करे, स्थगन आदेशों की तामील और अनुपालन की पारदर्शी व्यवस्था विकसित करे तथा शासकीय संपत्तियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे—ताकि कानून का सम्मान बना रहे और न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास अटूट रहे।


