वैदिक नववर्ष की दहलीज पर प्रशासनिक जवाबदेही और सुरक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल
वैदिक परंपरा के अनुसार जब पुराना वर्ष समाप्ति की ओर अग्रसर होता है और नववर्ष का शुभारंभ होता है, तब समाज आत्ममंथन करता है—बीते वर्ष की घटनाओं, उपलब्धियों और चुनौतियों का मूल्यांकन करता है। यही समय है जब शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और आमजन की सुरक्षा जैसे विषयों पर गंभीर चिंतन अपेक्षित होता है।
बीते वर्ष की घटनाओं पर दृष्टिपात करें तो मऊगंज क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों सहित रीवा जिले के मंगवां विधानसभा क्षेत्र से जुड़े मामलों में सुरक्षा और धमकियों को लेकर अनेक चर्चाएं सामने आईं। विशेष रूप से एक थाने के रोजनामचा (डेली डायरी) में दर्ज कथित धमकियों के वायरल होने से जनमानस में कई प्रश्न खड़े हो गए हैं। यदि जनप्रतिनिधियों अथवा पुलिस अधिकारियों द्वारा स्वयं को खतरे में दर्शाया जा रहा है, तो ऐसी परिस्थितियों में सुरक्षा के क्या मानक अपनाए जा रहे हैं? क्या केवल औपचारिक सुरक्षा पर्याप्त है या वास्तविक जोखिम का आकलन भी किया जा रहा है?
यह प्रश्न भी जनचर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि कोई व्यक्ति रोजनामचा में अपने लिए खतरे का उल्लेख करता है, तो प्रशासन द्वारा उसे अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थान—जैसे पुलिस लाइन—में रखने अथवा अतिरिक्त सुरक्षा उपलब्ध कराने पर विचार क्यों नहीं किया जाता? भविष्य में यदि कोई अप्रिय घटना घटित होती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या तब यह माना जाएगा कि खतरे की आशंका को गंभीरता से नहीं लिया गया, या इसे प्रशासनिक चूक के रूप में देखा जाएगा?
रोजनामचा कोई निजी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक शासकीय अभिलेख है। इसका उद्देश्य पारदर्शिता और विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करना है। यदि इसे व्यक्तिगत प्रभाव, दबाव या प्रचार का माध्यम बनाया जाता है, तो इससे प्रशासनिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। किसी भी व्यक्ति का नाम लिखकर उसे सार्वजनिक रूप से वायरल करना और फिर संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर न देना, न्यायसंगत प्रक्रिया की भावना के विपरीत माना जाएगा।
वर्तमान समय में पुलिस पर जनता की सुरक्षा का दायित्व है, किंतु यदि आम नागरिकों में ही भय का वातावरण व्याप्त हो—चाहे वह अपराधियों से हो या प्रशासनिक कार्यप्रणाली से—तो यह स्थिति चिंताजनक है। आवश्यकता इस बात की है कि रीवा एवं मऊगंज जिले के ग्रामीण अंचलों सहित सभी थानों की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। यह भी देखा जाए कि कितने थाना प्रभारी एवं पुलिसकर्मी दबाव, संसाधनों की कमी अथवा बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर कार्य कर रहे हैं।
नववर्ष के आगमन पर समाज की अपेक्षा है कि शासन-प्रशासन आत्ममंथन कर पारदर्शिता, जवाबदेही और सुरक्षा के मानकों को सुदृढ़ करे। जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों—दोनों की सुरक्षा समान रूप से सुनिश्चित होनी चाहिए। कानून का उद्देश्य भयमुक्त समाज की स्थापना है; यदि भय बना रहे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा आहत होती है।
आवश्यक है कि शासन स्तर पर इस विषय में गहन अध्ययन कर ठोस दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की अनहोनी से पूर्व ही प्रभावी कदम उठाए जा सकें। नववर्ष तभी सार्थक होगा जब प्रशासन और जनता के बीच विश्वास की नई शुरुआत हो।

