रीवा बैकुंठपुर पुलिस की तत्परता से परिवार से मिलन, वन स्टॉप सेंटर की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
रीवा, 5 मई 2026। जिले के बैकुंठपुर थाना क्षेत्र से एक संवेदनशील मामला सामने आया है, जिसमें एक ओर पुलिस की मानवीय संवेदनशीलता और तत्परता की सराहना हो रही है, वहीं दूसरी ओर वन स्टॉप सेंटर रीवा की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दिनांक 3 मई 2026 को बैकुंठपुर थाना क्षेत्र के एक गांव में लगभग 14 वर्षीय एक नाबालिग बालिका संदिग्ध अवस्था में अकेले घूमती हुई मिली। ग्रामीणों ने जब उससे उसका नाम-पता पूछा तो वह स्पष्ट जानकारी नहीं दे सकी। स्थिति को गंभीर मानते हुए ग्रामीणों ने तत्काल बालिका को बैकुंठपुर थाने पहुंचाकर पुलिस के सुपुर्द कर दिया।
थाना प्रभारी निरीक्षक श्रृंगेश सिंह ने बालिका से पूछताछ की, किंतु वह अपनी पहचान बताने में असमर्थ रही। इसके बाद पुलिस ने नियमानुसार कार्रवाई करते हुए महिला सुरक्षा के मद्देनजर बालिका को वन स्टॉप सेंटर रीवा भेजने का निर्णय लिया। पुलिस टीम में हेड कांस्टेबल वीरेंद्र तिवारी, महिला आरक्षक साइन बानो एवं आरक्षक आशुतोष मिश्रा शामिल थे।
वन स्टॉप सेंटर पर लापरवाही के आरोप
बताया जा रहा है कि जब पुलिस टीम बालिका को लेकर वन स्टॉप सेंटर रीवा पहुंची, तो वहां पदस्थ महिला अधिकारी द्वारा न केवल असहयोगपूर्ण रवैया अपनाया गया, बल्कि बालिका को बिना किसी चिकित्सकीय परीक्षण के “मानसिक रूप से अस्वस्थ” बताते हुए उसे केंद्र में रखने से इंकार कर दिया गया।
आरोप है कि रात का समय होने के बावजूद केंद्र का गेट तक नहीं खोला गया और पुलिस टीम को बालिका सहित वापस लौटना पड़ा। जबकि नियमों के अनुसार, गुमशुदा, असहाय या संकटग्रस्त महिलाओं एवं बालिकाओं को अस्थायी संरक्षण प्रदान करना वन स्टॉप सेंटर की मूल जिम्मेदारी होती है।
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—क्या बिना मेडिकल जांच के किसी नाबालिग को मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किया जा सकता है? क्या संकट की स्थिति में भी संस्थागत संवेदनशीलता का अभाव स्वीकार्य है?
पुलिस ने दिखाई जिम्मेदारी, रातभर चलाया सर्च अभियान
वन स्टॉप सेंटर से निराश होकर लौटने के बाद भी बैकुंठपुर पुलिस ने हार नहीं मानी। थाना प्रभारी श्रृंगेश सिंह के नेतृत्व में पूरी टीम ने रातभर बालिका के परिजनों की तलाश में सघन सर्च अभियान चलाया।
लगातार प्रयासों के बाद आखिरकार पुलिस टीम बालिका के परिजनों तक पहुंचने में सफल रही और सुरक्षित रूप से बच्ची को उसके माता-पिता के सुपुर्द कर दिया गया। परिजनों ने स्पष्ट किया कि उनकी बच्ची मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ है, जिससे वन स्टॉप सेंटर के दावे पर और भी प्रश्न उठने लगे हैं।
प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने महिला एवं बाल सुरक्षा से जुड़े संस्थानों की जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर गंभीर बहस छेड़ दी है। यदि आरोप सत्य हैं, तो यह न केवल लापरवाही बल्कि संवेदनहीनता का भी उदाहरण माना जाएगा।
स्थानीय नागरिकों एवं सामाजिक संगठनों ने मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
पुलिस टीम की सराहनीय भूमिका
इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में बैकुंठपुर थाना पुलिस की सक्रियता और संवेदनशीलता सराहनीय रही। थाना प्रभारी श्रृंगेश सिंह, हेड कांस्टेबल वीरेंद्र तिवारी, महिला आरक्षक साइन बानो एवं आरक्षक आशुतोष मिश्रा ने पूरी रात मेहनत कर एक मासूम को उसके परिवार से मिलाने का सराहनीय कार्य किया।

