रीवा में प्रशासनिक सख्ती पर बवाल: कलेक्टर की कार्यशैली के खिलाफ सड़क पर उतरे अधिकारी-कर्मचारी
महिला APO के मीटिंग में बेहोश होने के बाद भड़का आक्रोश, कमिश्नर को सौंपा ज्ञापन; कलेक्टर बोले – “जनता के काम हर हाल में होंगे”
रीवा जिले में प्रशासनिक सख्ती और कार्यशैली को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारी और कर्मचारी अब खुलकर कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के खिलाफ मोर्चा खोलते नजर आ रहे हैं। बुधवार को जिलेभर के सैकड़ों अधिकारी-कर्मचारी सामूहिक अवकाश पर चले गए और जिला पंचायत कार्यालय में प्रदर्शन कर कमिश्नर को ज्ञापन सौंपते हुए मानसिक उत्पीड़न, अभद्र व्यवहार और अव्यवहारिक कार्यदबाव के गंभीर आरोप लगाए।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। एक ओर कलेक्टर द्वारा योजनाओं के क्रियान्वयन में सख्ती बरती जा रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठन इसे “तानाशाहीपूर्ण रवैया” बताते हुए विरोध पर उतर आए हैं।
मीटिंग में महिला अधिकारी की तबीयत बिगड़ने से बढ़ा विवाद
विवाद उस समय और गहरा गया जब कलेक्टर कार्यालय में आयोजित समीक्षा बैठक के दौरान सिरमौर जनपद पंचायत की एपीओ (APO) सुनीता तिवारी अचानक बेहोश हो गईं। उपस्थित कर्मचारियों के अनुसार बैठक में लगातार योजनाओं की समीक्षा के दौरान तीखे सवाल-जवाब और अत्यधिक दबाव का माहौल बना हुआ था। कर्मचारियों का आरोप है कि लगातार मानसिक तनाव और कार्यभार के कारण महिला अधिकारी की हालत बिगड़ी।
घटना के बाद कर्मचारियों का आक्रोश खुलकर सामने आ गया। कई कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि विभागीय बैठकों में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है तथा कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई जाती है, जिससे कार्यस्थल का वातावरण तनावपूर्ण हो गया है।
संयुक्त मोर्चा का प्रदर्शन, “सम्मान चाहिए, प्रताड़ना नहीं”
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर जिले के विभिन्न जनपद पंचायतों से अधिकारी और कर्मचारी रीवा जिला पंचायत परिसर में एकत्रित हुए। प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी करते हुए कहा कि वे शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन के विरोधी नहीं हैं, लेकिन सम्मानजनक वातावरण में कार्य करना उनका अधिकार है।
कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि—
अव्यवहारिक लक्ष्य थोपे जा रहे हैं
छुट्टियों और अवकाश के दिनों में भी जबरन ड्यूटी कराई जा रही है
मामूली त्रुटियों पर नोटिस और वेतन कटौती की कार्रवाई हो रही है
सेवा समाप्ति जैसे कठोर दंडों की धमकी दी जा रही है
वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि प्रशासनिक अनुशासन के नाम पर कर्मचारियों का मानसिक शोषण स्वीकार नहीं किया जाएगा।
जिला पंचायत में तालाबंदी जैसे हालात
सामूहिक अवकाश के चलते बुधवार को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का कामकाज लगभग ठप रहा। जिला पंचायत कार्यालय सहित कई जनपद पंचायतों में सन्नाटा पसरा रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे विकास कार्यों, निर्माण गतिविधियों और योजनाओं की मॉनिटरिंग पर भी असर देखने को मिला।
कई ग्रामीण हितग्राहियों को दफ्तरों से निराश लौटना पड़ा। प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, पंचायत संबंधी भुगतान और अन्य ग्रामीण विकास योजनाओं से जुड़े कार्य प्रभावित रहे।
कलेक्टर का स्पष्ट संदेश – “हम जनता के सेवक हैं”
पूरा मामला गरमाने के बाद कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रशासन का पहला दायित्व जनता के प्रति है और योजनाओं का क्रियान्वयन हर हाल में सुनिश्चित किया जाएगा।
कलेक्टर ने कहा—
> “हम जनता के लिए हैं, इसलिए जनता के काम करने ही पड़ेंगे। यदि किसी को कोई समस्या है तो संवाद के माध्यम से उसका समाधान निकाला जाएगा, लेकिन शासन की विकास योजनाओं में लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।”
कलेक्टर के इस बयान से साफ है कि प्रशासन कार्यों में ढिलाई के पक्ष में नहीं है और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
पीएम आवास मामले में सीईओ जनपद को नोटिस
इसी बीच कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने प्रधानमंत्री आवास योजना में अनियमितता के एक मामले को गंभीरता से लेते हुए जनपद पंचायत गंगेव की सीईओ प्राची चौबे को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
जनसुनवाई में ग्राम बड़ोखर, तहसील सिरमौर निवासी रामलखन नामदेव ने शिकायत की थी कि प्रधानमंत्री आवास योजना के सर्वे के दौरान ग्राम रोजगार सहायक द्वारा अनाधिकृत राशि की मांग की गई तथा राशि न देने पर उन्हें योजना के लाभ से वंचित कर दिया गया।
मामले को गंभीर मानते हुए कलेक्टर ने तीन दिवस के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इस कार्रवाई को प्रशासनिक सख्ती के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
प्रशासन बनाम कर्मचारी: बीच में पिस रही जनता
रीवा में उपजा यह विवाद अब केवल कर्मचारियों और प्रशासन के बीच की तनातनी नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा असर आम जनता और विकास कार्यों पर दिखाई देने लगा है। एक तरफ प्रशासन योजनाओं में तेजी और पारदर्शिता लाने के लिए सख्ती बरत रहा है, तो दूसरी तरफ कर्मचारी इसे असहनीय दबाव और अपमानजनक व्यवहार बता रहे हैं।
फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। कर्मचारी संगठन सम्मानजनक कार्यसंस्कृति की मांग पर अड़े हैं, जबकि प्रशासन जवाबदेही और कार्यकुशलता से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा। आने वाले दिनों में यह विवाद और गहराने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

